अबूझ पहेली मस्तानी

अबूझ पहेली मस्तानी
पेशवा बाजीराव व मस्तानी

@राकेश कुमार अग्रवाल

हीर-रांझा, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद, ढोला-मारू यदि आम आदमी के प्रेम-प्रतीक रहे हैं तो माण्डू की रानी रूपमती और बाज-बहादुर, रजिया-सुल्तान और हब्शी गुलाम जमालुद्दीन, नूरजहाँ-और जहाँगीर, औंरगजेब और हीराबाई, बाजीराव और मस्तानी की प्रणय गाथायें महलों और किलों से निकलकर इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई।

बाजीराव पेशवा के बारे में इतिहास बहुत कुछ स्पष्ट दृष्टिपात करता है जबकि मस्तानी किस धर्म की थी ? उसके पिता कौन थे ? जैसे तमाम सवालों के कारण इतिहासकारों के मध्य अबूझ पहेली बनी रहीं। बाजीराव की मस्तानी के प्रति दीवानगी एवं दुखान्त प्रेम कहानी आज भी द्रवित करती है।  

"छत्ता तोरे राज्य में, धक-धक धरती होय । 
जित-जित घोड़ा मुख करे तित्त फत्ते होय।।"

बुन्देलखण्ड के वीरप्रतापी महाराजा छत्रसाल की शूरवीरता को इसी से समझा जा सकता है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में 52 से अधिक लड़ाइयाँ जीतीं। 
महाराजा चम्पतराय और रानी सारन्ध्रा के बेटे छत्रसाल का जन्म ज्येष्ठशुक्ल 3 भृगुवार वि0सं0 1706 अर्थात् 26 मई सन् 1649 में हुआ था।

"सम्वत् सत्रह सै लिखे, और आगरे बीस। 
लागत बरस बाइस है, उमड़ चलौ अवनीस।। 
सत्रह सौ घट जेष्ठ सित, तीज सुभग भृगुवार। 
गंगधूल मृगशिर नखत, छत्र धर्म अवतार ।।"

छत्रसाल का बचपन मामा के यहाँ बीता, बहीं उनकी शिक्षा, अस्त्र-शस्त्र प्रशिक्षण, घुडसवारी व शिकार करना उन्होंने सीखा। महाराज चम्पतराय ने छत्रसाल की शादी दैलवारे में देवकुंवर उर्फ कमलावती के साथ तय कर दी थी।

1671 में महाराजा छत्रसाल ने मोर पहाड़ियों के निकट अपनी सेना इकट्ठी की और युद्ध के मैदान में कूद पड़े। 1680 में स्वामी प्राणनाथ के निर्देशन में मऊ-महेबा में उनका राज्याभिषेक किया गया। 1683 में महाराजा छत्रसाल महोबा को फतेह करते हुए पनवाड़ी, छितरवारा होते हुए जैतपुर पहुंचे। यही क्षेत्र बाद में जैतपुर राज्य कहलाया।

17 बड़ी लड़ाइयों समेत छत्रसाल ने 52 लडाइयां लड़ी। 1708 में मुगलबादशाह बहादुरशाह ने छत्रसाल को राजा की उपाधि व सम्मान दिया। 1710 ई0 में बहादुरशाह के अनुरोध पर अपना अन्तिम युद्ध लड़ने लोहागढ़ गए। चरखारी के मंडनराय लोधी के सहयोग से उन्होंने लोहागढ़ पर विजय पाई।

लोहागढ़ की विजय के बाद महाराज छत्रसाल ने अपनी सम्पत्ति का बंटवारा कर बड़े बेटे हृदयशाह को गढाकोटा, चित्रकूट, नागौद, मैहर, कालिंजर, शाहगढ़, वीर सिंहपुर, सुहाबल क्षेत्र जगतराज को जैतपुर, अजयगढ़, सरीला, कालपी, गुरसरांय, झांसी, बाँदा, विजावर, मऊ, मोहनसिंह को श्रीनगर, पद्मसिंह को जिगनी एवं मण्डयरायलोधी को माण्डोपुरी की जागीर दी गई।

महाराज छत्रसाल की पत्नी कमलावती के दो पुत्र हुए थे। इनमें बड़े पुत्र हृदयशाह व छोटे का नाम जगतराज था। औरंगजेब के बाद दिल्ली सत्ता में मुगलों में संघर्ष बढ़ता जा रहा था। उनके फौजदार, बुन्देलखण्ड की ओर बढने का प्रयास कर रहे थे। मई 1921 में दलेल खां पन्ना-अजयगढ़ से बढ़ा महाराज जगतराज को जब इसकी सूचना मिली तो वीर बुन्देलों ने मौदहा-तिंदवारी के पास उसे घेर मौत के घाट उतार दिया। दलेल खां की मौत से दुखी बंगश खां बदला लेने पर उतारू था। इसकी भनक जब महाराजा छत्रसाल को हुई तो वे चिन्तित हो उठे। संयोग से यह वही समय था जब हृदयशाह व जगतराज में मनमुटाव हो गया था।

राजा छत्रसाल ने अपने पुत्रों के बीच साम्राज्य का विभाजन किया जिसमें बड़े बेटे हृदयशाह को पन्ना और छोटे जगतराज को जैतपुर का राज्य मिला। महाराजा छत्रसाल ने ही जैतपुर में किला, बादल महल एवं ड्योढ़ी महल का निर्माण करवाया।  मुहम्मद शाह ने 1720 ई0 में मुहम्मद खां बंगश को इलाहाबाद का नया सूबेदार नियुक्त कर दिया। साथ ही इससे कालपी और एरच राज्यों को जोड़ दिया गया।

बंगश की नियुक्ति छत्रसाल के लिए अभिशाप बन गई। उसने सबसे पहले पूर्वी बुन्देलखण्ड के उन क्षेत्रों पर अपनी नजर डाली जिन पर पहले से ही छत्रसाल का अधिकार था। दोनों में टकराव हुआ और इस टकराव में बंगश के चेले दिलेर खां को सन् 1721 में जान से हाथ धोना पड़ा। दिलेर खां की मौत से बंगश बौखला गया।

जन्मजात अफगान पठान बंगश डील-डौल में लम्बा-चैड़ा एवं बहादुर योद्धा था। छत्रसाल के बेटे हृदयशाह ने रीवा पर आक्रमण कर बघेलखण्ड को अपने अधिकार में ले लिया था। मौका देखकर बंगश ने सन् 1727 ई0 में यमुना का पानी उतरते ही छत्रसाल के अधिकृत क्षेत्रों पर आक्रमण शुरू कर दिए। बंगश ने न केवल छत्रसाल के स्वामित्व वाले कुछ क्षेत्रों गढ़ करकेली, कल्याणपुर, माधौगढ़, वीरसिंहपुर को अपने कब्जे में ले लिया बल्कि छत्रसाल को स्वयं जैतपुर के किले में जाकर रहना पड़ा। इचैली नामक स्थान पर 1727 में बुन्देली और बंगश सेना का युद्ध हुआ जिसमें छत्रसाल पराजित हुए। बुन्देलों ने सालट के जंगलों में शरण ली। 1728 में बंगश ने भयंकर आक्रमण करके जैतपुर किले की घेराबन्दी कर दी। छत्रसाल को विवश होकर आत्मसमर्पण करना पड़ा। छत्रसाल ने संकट की घड़ी में बुद्धि चातुर्य का इस्तेमाल करते हुए बंगश से होली मनाने के लिए मऊ जाने की इजाजत ली। वहाँ से उन्होंने गुपचुप ढंग से पूना के बाजीराव पेशवा को मदद की गुहार कुछ इस तरह लगाई:-

"जो गति भई गजग्राह की, सो गति भई है आय। 
बाजी जात बुन्देल की, राखौ बाजीराव।।"

लडाकू पेशवा बाजीराव ने अपने युद्ध कौशल से हैदराबाद निजाम से लेकर पुर्तगालियों एवं जंजीरा सिद्दियों को पराजित कर अपना लोहा मनवाया था। वह स्वयं नर्मदा के उत्तर में अपने मराठा साम्राज्य के विस्तार के लिए बड़ा लालायित था। उसे छत्रसाल के प्रस्ताव में आशा की किरण नजर आई। परिणाम स्वरूप पेशवा एक विशाल सेना के साथ बंगश के विरूद्ध जंग में छत्रसाल के सहायतार्थ शीघ्रता से आ पहुंचा। मराठों और बुन्देलों ने मिलकर मार्च 1729 ई में बंगश को घेर लिया। 6 माह की शांत युद्ध नीति घेराबन्दी के बाद जैतपुर किले में धीरे-धीरे रसद का अभाव होने से मुहम्मद खां बंगश के योद्धाओं में आपस में मारकाट होने लगी असहाय बंगश को इस शर्त पर अभयदान मिला कि वह भविष्य में कभी भी छत्रसाल के राज्य पर आक्रमण नहीं करेगा।

महाराजा छत्रसाल वीर योद्धा चम्पतराय व सारन्ध्रा के पुत्र थे। महाराजा छत्रसाल के समय में बुन्देली युवतियों को भी युद्धकला में निपुण बनाए जाने की परम्परा थी। तभी मस्तानी तलवारबाजी, भाला  
चलाने एवं घुड़सवारी में दक्ष थी। रानी की बहादुरी पर तो छत्रसाल ने खुश होकर उसे जागीर दी थी। जो बाकायदा दर्ज है:- 

"जो जान है 
सो मान है 
ना मान है 
सो जान है"

वृद्धावस्था में राजा छत्रसाल ने बाजीराव को मुंहबोला बेटा यानी दामाद मान लिया, झांसी, गुना का क्षेत्र मराठों को मिला। जैतपुर के युद्ध ने मराठों को बुन्देलखण्ड में स्थापित किया। इसी युद्ध में पेशवा ने मस्तानी के रूप सौंदर्य के साथ-साथ उसका युद्ध कौशल देखा तो अपलक देखते ही रह गए।

पन्ना में विजयोत्सव:- बंगस पर विजयोपरान्त एवं जैतपुर की गद्दी की सलामती पर पन्ना में विजयोत्सव का आयोजन किया गया जिसमें बाजीराव पेशवा का बुन्देली परम्परा में सम्मान किया गया। भव्य बुन्देला दरबार में अनिंद्य सौंदर्य की स्वामिनी मस्तानी के नृत्यकौशल ने बाजीराव को मोहित कर दिया। बाजीराव विस्फारित ने़त्रों से मस्तानी को निहारते ही रह गए।

तभी महाराजा छत्रसाल ने बाजीराव से वचन मांगा कि ‘‘बाजीराव पेशवा ! क्या आप मस्तानी के गर्भ से उत्पन्न सन्तानों को अपनी जागीर में उत्तराधिकार देना स्वीकार करते हैं ?” बाजीराव ने भरी सभा में शपथ लेते हुए आश्वासन दिया कि ‘‘मस्तानी अब मेरे संरक्षण में सदैव सुरक्षित रहेगी। सम्मान व प्यार प्राप्त करेगी एवं उससे उत्पन्न संतानें मेरी उत्तराधिकारी घोषित की जाएंगी।”

मस्तानी:-  मस्तानी को लेकर इतिहास में इतना लिखा गया है कि जिससे नए-नए तरह के विरोधाभास पैदा हुए। मस्तानी छत्रसाल की बेटी थी या किसी मुस्लिम की बेटी थी। छत्रसाल की वंशावली में मस्तानी का नाम क्यों नहीं है ?

डा. गायत्री नाथ पन्त के अनुसार छत्रसाल ने मध्य एशिया के जहानत खां की एक दरबारी महिला से विवाह किया था। मस्तानी उसी की बेटी थी। एहसान आवारा ने अपने 30 साल लम्बे शोध में देश के विभिन्न इतिहासकारों, ऐतिहासिक बयानों, व तथ्यों की खुर्दबीन कर मस्तानी कुंवर साहिबा से जुड़ी 28 विरोधाभासी कहानियों का विवेचन किया। लेकिन तर्क व तथ्यों की कसौटी पर सभी कहानियाँ उन्हें सच्चाई पर परदा डालने की नाकाम कोशिश नजर आईं।

उनके अनुसार मस्तानी कुंवर बुन्देलाकन्या थी और महाराजा छत्रसाल की पुत्री थी। वह अपने पिता छत्रसाल की भांति महामती स्वामी प्राणनाथ के प्रणामी पंथ की मानने वाली थी। जो स्वयं को कृष्ण का अवतार कहते थे। तभी मस्तानी कृष्ण की मूर्ति के सम्मुख नृत्य प्रस्तुत कर उनकी आराधना करती थी। बुन्देला होने के कारण तलवार व भाला चलाना एवं घुड़सवारी उसने सीखी थी। छत्रसाल की 19 रानियों, 52 पुत्रों एवं तीन पुत्रिओं का जिक्र उनकी वंशावली में है लेकिन मस्तानी का कहीं भी उल्लेख नहीं है।

मस्तानी का पूना आगमन:- महाराजा छत्रसाल की सहायता कर मुहम्मद खां बंगश को नकेल डालकर पेशवा बाजीराव मस्तानी को साथ लेकर जुलाई 1729 में वापस पूना पहुंचे। बंगश खां पर विजय एवं बुन्देलखण्ड में मराठा शासन की दस्तक से पूना क्षेत्र में महीनों जश्न मनाया गया। मस्तानी को अलग से ठहराने की व्यवस्था की गई। 

मस्तानी की कुशल योद्धा के साथ-साथ नृत्यांगना के रूप में पूना में 11 जनवरी 1730 को तब पहचान बनी जब उन्होंने बाजीराव पेशवा के पुत्र नाना साहब के विवाह के अवसर पर अपनी नृत्य कला का जादू दिखाया। बाजीराव ने जनवरी 1730 में शनिवार के दिन मस्तानी के लिए अलग से वाड़ा का निर्माण शुरू कराया। 2 वर्ष में बनकर तैयार हुए इस वाड़े का नाम शनिवारवाड़ा रखा गया।

यही वह दौर था जब मस्तानी को मातृत्व सुख मिला। वह बाजीराव के बेटे की माँ बनी। नाम रखा गया कृष्ण राव क्योंकि मस्तानी भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त थी। लेकिन जब कृष्णराव के दीक्षा-संस्कार की बात आई तो पूना के कर्मकाण्डी विद्वानों ने मुस्लिम माँ से उत्पन्न संतान के कारण दीक्षा देने से मना कर दिया जिससे गुस्साए बाजीराव ने उसका नाम कृष्ण राव के साथ-साथ शमशेर बहादुर भी रख दिया।

बाजीराव व मस्तानी को अलग करने के लिए पूना में महल के अन्दर व बाहर से षड़यन्त्र रचे जाने लगे। दोनों पर आरोप लगने लगे कि जबसे बाजीराव मस्तानी के सम्पर्क में आए हैं मांस-मदिरा का सेवन करने लगे हैं। मस्तानी के ऐशो-आराम में बेइन्तहा धन का अपव्यय किया जा रहा है। बड़की के निकट दीवा के जंगलों में बने मस्तानी तालाब को लेकर भी धन की बर्बादी के आरोप लगाए गए। पेशवा बाजीराव व मस्तानी को लेकर पूना के ब्राह्मणों का विद्रोह भी लगातार बढ़ता जा रहा था।

पेशवा बाजीराव के भतीजे रघुनाथ राव के यज्ञोपवीत संस्कार व सदाशिव राव के विवाह समारोह में वहाँ के ब्राह्मणों ने जाने से इंकार कर दिया। पेशवा परिवार पहले से ही बाजीराव से क्षुब्ध चल रहा था। आग में घी डालने का काम तब हुआ जब बाजीराव छत्रपति शाहू जी से मिलने मस्तानी के साथ ‘सतारा’ पहुंच गए। महाराज को जब इसका पता चला तो उन्होंने दरबान से बाजीराव से मिलने से मना कर दिया।

पूना ही नहीं सतारा के लोगों ने भी बाजीराव से मस्तानी के मुस्लिम महिला होने का हवाला देते हुए सम्बन्ध विच्छेद करने के लिए दबाब बनाया। लेकिन बाजीराव ने यह कहकर सबके मुंह पर ताला जड़ दिया कि ‘‘मस्तानी बुन्देला परिवार छोड़कर मेरे साथ आ गई और मैं इसे छोड़ दूं .......... ?”

बाजीराव की माता तथा उसके छोटे भाई ने मस्तानी के साथ उनके रिश्ते का शुरू से ही पुरजोर विरोध किया। विरोध करने के पीछे केवल मस्तानी का मुस्लिम होना नहीं वरन् उन्हें डर था कि मस्तानी की संतानों को ही बाजीराव पूना की गद्दी न सौंप दें।

छल-प्रपंचों के इसी दौर में बाजीराव को मराठा विद्रोह निपटने के लिए पूना छोड़कर जाना पड़ा। मस्तानी से बाजीराव के दूर होते ही पेशवा के ज्येष्ठ पुत्र नाना साहब व उनके अनुज चिमणाजी आपा ने सन् 1739 ई0 में मस्तानी के विरूद्ध षड़यन्त्र रचा। मस्तानी को सुरक्षा के नाम पर शनिवारवाड़ा में नजरबन्द कर दिया गया। मस्तानी को दासियों ने पूरी घटना से अवगत कराते हुए बताया कि उन्हें इसी मस्तानी महल में बन्दी बना लिया गया है, एवं महल के चारों ओर चैकी बैठा दी गई है। पाँच वर्षीय शमशेर बहादुर को छाती से लगाए मस्तानी तो इस सूचना से सुध-बुध खो बैंठीं। राव साहब के बगैर एक-एक पल बरस जैसा लगता। ऐसे में उन्होंने नाना साहब को पत्र लिखकर गुजारिश की कि ‘‘कृपया आप रात में मुझे व पाँच साल के निरपराध अबोध शमशेर बहादुर के साथ कैद न रखें। आज्ञा दें कि मैं रात में वहाँ सो जाया करूँ, जहाँ महल की अन्य औरतें सोया करती हैं। कृपया मुझे इस उत्पीड़न भरी यातना से उबारें।‘‘ फलस्वरूप नाना साहब ने द्रवित होकर मस्तानी के पास रात्रि में दासियों को सोने की इजाजत दे दी।”

सैन्य अभियान के दौरान पेशवा बाजीराव को गुप्तचर के माध्यम से मस्तानी को महल में नजरबन्द किए जाने की सूचना मिली। 24 नवम्बर 1739 ई0 को गुप्तचर के माध्यम से मस्तानी को बाजीराव का सन्देश मिला कि वह पाटस में है। मस्तानी महल के पास ही पार्वती बाग के शिव मन्दिर में पूजा-अर्चन के बहाने अपने विश्वस्त अश्वारोहियों के साथ पुरूष वेष धारण कर पाटस जा पहुंची। आमने-सामने एक दूसरे को देखकर दोनों की अश्रुधारा बह निकलीं। बाजीराव ने मस्तानी को आश्वस्त किया कि हम दोनां पूना में आजीवन साथ-साथ रहेंगे।

इधर मस्तानी के महल से अचानक निकल जाने की सूचना जब पूना में नाना साहब को मिली तो क्रोधाग्नि में जल रहे नाना ने माँ काशीबाई व दादी माँ राधाबाई को ऐसे में उपाय बताने के लिए पत्र लिखा।

पत्र पाते ही बाजीराव की पहली पत्नी काशीबाई सौतिया डाह में जल उठीं। उन्होंने अपनी सास राधाबाई से विचार-विमर्श के बाद निर्णय लिया कि पेशवा परिवार के हितचिन्तक महादजीपन्त, पुरन्दरे व काका मोरशेट को राव साहब के पास पाटस भेजा जाए। मस्तानी की राव साहब से आसक्ति कम करने के लिए उन्हें पूना में रखा जाए। शमशेर बहादुर की सभी सुख-सुविधाओं का विशेष ख्याल रखा जाए।

पेशवा परिवार के हितैषी मस्तानी को समझा-बुझाकर पाटस से वापस पूना ले आए। उधर पाटस में रह रहे बाजीराव की मस्तानी के वियोग में सेहत बिगड़ने लगी। उनके लगातार गिरते स्वास्थ्य से चिन्तित बाजीराव के छोटे भाई चिमणा जी आपा ने अपनी माँ राधाबाई को पत्र लिखकर उनके गिरते स्वास्थ्य से अवगत कराते हुए उनके लिए कोई उपाय करने को कहा। 

मस्तानी की हत्या का षड़्यन्त्र
ज्यों-ज्यों मराठा परिवार मस्तानी को बाजीराव से दूर करने का प्रयास करते त्यों-त्यों दोनों में आसक्ति और भी बढती जा रही थी। ऐसे में काशीबाई से गुप्त मंत्रणा में यह तय हुआ कि शमशेर को हटाकर क्यों न मस्तानी की हत्या करा दी जाए। मस्तानी की हत्या से बाजीराव विचलित न हो जाएं एवं गुस्से में आकर कोई गलत कदम न उठा लें कहीं मैं अपने सर्वश्रेष्ठ सेनापति को न खो दूँ। इस डर से मस्तानी की हत्या की योजना पर शाहूजी ने अपनी असहमति दे दी। छत्रपति शाहूजी द्वारा योजना को खारिज किए जाने का परिणाम यह हुआ कि मस्तानी की हत्या का षड्यन्त्र परवान न चढ़ सका।

बाजीराव की लगातार अस्वस्थता के चलते छत्रपति शाहूजी ने 12 जनवरी 1740 ई0 को सहानुभूति से भरा एक पत्र चिमणाजी आपा को लिखा। जिसमें उन्होंने मस्तानी को बाजीराव को सौंपने का सुझाव दिया था। शाहूजी के सुझाव से बौखलाए चिमणाजी आपा ने 14 जनवरी को नाना साहब को पत्र भेजकर मस्तानी को विश्वास में लेकर कैद में रखने को कहा।

तारीख 26 जनवरी 1740 ई0, बाजीराव के बड़े बेटे चिमणाजी आपा के निर्देश पर छोटे बेटे नाना साहब मस्तानी महल जाकर अपनी सौतेली माँ से नव वर्ष के उपलक्ष्य में पार्वती बाग में आयोजित होने वाले उत्सव में प्रजा की माँग पर नृत्यगान का न्यौता देते हैं। समारोह में काशीबाई के साथ-साथ राव साहब के पाटस से आगमन की जानकारी उन्हें दी जाती है। मस्तानी अपने प्रियतम से मिलने की आस में सज-संवर कर बग्घी पर बैठकर मस्तानी महल से रवाना होती हैं वहाँ खचाखच भरे पार्वती बाग में अपनी आकर्षक प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।

मध्य रात्रि का समय मस्तानी राव साहब से मिलन को व्याकुल थीं लेकिन राव साहब को पार्वती बाग में न पाकर मस्तानी बग्घी में बैठकर महल को चल पड़ती हैं। मस्तानी को महल में पहुंचने के पूर्व ही घोड़ों पर सवार होकर आए सैनिक चारों ओर से घेर लेते हैं। नाना साहब के निर्देश पर उन्हें बन्दी बना लिया जाता है। मस्तानी की चीखें फिजाओं में गूंजती रहती हैं। उनके 6 वर्षीय बेटे को भी उनसे अलग कर दिया जाता है।

दक्षिण के निजाम का बेटा नासिरजंग इसी दौर में आक्रमण कर देता है। गुप्तचरों से सूचना मिलने पर बाजीराव सैनिकों के साथ छापामार रणनीति से धावा बोलकर नासिर जंग के छक्के छुड़ाता है। पराजित नासिर जंग बाजीराव से सन्धि को विवश हो जाता है।

नासिर जंग को पराजित कर गोदावरी तट से बाजीराव वापस पाटस आ गए। युद्ध के बाद एकान्त में आते ही बाजीराव फिर से मस्तानी के वियोग में डूब गए। पारिवारिक दबाब ने बाजीराव को ऐसा मजबूर किया कि वे मस्तानी को पाने के लिए अपनी माँ राधाबाई, पत्नी काशीबाई, युवा पुत्र नाना साहब व छोटे पुत्र जनार्दन के विरूद्ध न कुछ कर सके न ही कुछ कह सके। मस्तानी के वियोग में बाजीराव ने खाना-पीना भी लगभग बन्द कर दिया। स्वास्थ्य चिन्ताजनक अवस्था में पहुंचा तो काशीबाई अपने छोटे बेटे जनार्दन को लेकर नर्मदा नदी के तट पर रावेर खेड़ा नामक स्थान जहाँ बाजीराव पड़ाव शिविर डाले थे जा पहुँची। काशीबाई ने उनकी जी जान से सेवा सुश्रुषा की। इधर चिमणाजी आपा ने बाजीराव की हालत से घबडाकर नाना साहब को पूना पत्र भेजा कि ‘‘तुम मस्तानी को तत्काल बन्दी जीवन से मुक्त कर रावेरखेड़ा भेजो ताकि वह राव साहब को देख लें।”

अन्त समय:- नाना साहब ने चाचा के पत्र पर मस्तानी को बन्दी जीवन से मुक्त तो कर दिया लेकिन निगरानी भी बैठा दी। 25 अप्रैल, 1740 ई0 का प्रथम पहर असहाय वीर योद्धा शिथिल अवस्था में मस्तानी की राह तकते-तकते शून्य में ही निहारता रहा। आँखों से चन्द अश्रु लुढके और बाजीराव की आँखें खुली की खुली रह गई। मस्तानी के विरह की वेदना में 41 वर्षीय वीर पेशवा असमय अधूरी प्रेम कहानी के साथ चिरनिद्रा में विलीन हो गया। 28 अप्रैल 1740 ई0 को रावेरखेड़ा के निकट नर्मदा नदी के तट पर उनके छोटे बेटे जनार्दन ने उन्हें मुखाग्नि दी।

पूना के मस्तानी महल में मस्तानी अपने प्रियतम की राह तकती कोई भी आहट पर राव साहब को याद करती तभी दूत ने अन्दर आकर उसे सूचना दी कि .................... राव साहब नहीं रहे.........।

हतप्रभ मस्तानी के यह सुनते ही कि राव साहब नहीं रहे उसके भी प्राण पखेरू उड़ गए। मस्तानी का सुहागन स्त्रियों की भाँति श्रृंगार किया गया। पूना से 30 किमी0 दूर ‘पावल‘ नामक स्थान पर मस्तानी का अन्तिम संस्कार करके समाधि निर्मित करा दी गई। रावेरखेड़ा में बाजीराव व पावल में मस्तानी की समाधि पौने तीन सौ वर्ष पूर्व के अमर प्रेम की दास्तां को जीवंत कर देती है।

नोटः- (मस्तानी के देह त्याग को कुछ लोग आत्महत्या तो कोई उनका सती होना भी बताते हैं।)