सूर्य मंदिर की नगरी रहली

सूर्य मंदिर की नगरी रहली

@ नितिन सोनी

भारत में कोणार्क, उलार्क, मोदेरा, कटारमल, रनकपुर, रहली, पहर, प्रतापगढ़, दक्षिणारक, देव, औंगौरी, बेलार्क, हंडिया, गया, महोबा, झालावाड़, राँची, जम्मू, कश्मीर, कंदाहा, ये 20 सूर्य मंदिर हैं। भारत के 20 सूर्य मन्दिरों में से रहली के सूर्य मंदिर का छठा स्थान है। रहली, मध्यप्रदेश के सागर जिले का ऐतिहासिक नगर है जो जिला मुख्यालय सागर से 42 किलोमीटर दूर स्थित है। रहली, प्राचीन मंदिरों की नगरी है, जिसमें से सबसे प्राचीन सूर्य मन्दिर है। रहली का सूर्य मंदिर ‘सुनार एवं देहार’ नदियों के पवित्र संगम पर स्थित है। इतिहासकारों के अनुसार रहली के सूर्य मंदिर का निर्माण दसवीं शताब्दी में चन्देल राजाओं ने करवाया था। कर्क रेखा में स्थित होने के कारण रहली के पूर्वाभिमुख सूर्य मंदिर का महत्त्व अत्याधिक है।

रहली, सागर जिले की एक ऐतिहासिक तहसील है, जिसे बुन्देलखण्ड का प्रवेश द्वार भी कहा जा सकता है, रहली का सबसे बड़ा आकर्षण यहां कर्क रेखा में सुनार और देहार नदियों के संगम स्थल पर स्थित 10वीं शताब्दी में निर्मित पूर्वाभिमुख दिव्य सूर्य मंदिर है, जिसकी अधिकांश लोगों को इसकी जानकारी नही है, कोणार्क की तरह भारत मे 20 अन्य सूर्य मन्दिर हैं, मध्यभारत में महोबा और रहली में सूर्य मन्दिर स्थापित है, लेकिन रहली का सूर्य मंदिर कर्क रेखा में स्थित होने के कारण इसका महत्त्व अत्याधिक बढ़ जाता है। वर्तमान में यह मंदिर उपेक्षित है, इस छोटे से मन्दिर में अद्भुत शिल्पकारी की गई है। नाग-युग्म का शिल्प तो दुर्लभ है।

’रहली ही क्यों’ - इसका एक कारण यह हो सकता है, महाराष्ट्र के पंढरपुर में भीमा और चन्द्रभागा नदियों के संगम तट पर विठ्ठल भगवान का मंदिर स्थापित है। चन्द्रभागा नदी, वहां चन्द्र के आकार में बहती है। इस प्रकार रहली में सुनार नदी चन्द्रमा के आकार में बहती है। ‘‘रहली’’ सुनार और देहार नदियों के संगम तट पर बसा नगर है शायद इसलिए रहली में पंढरपुर बनवाया गया।

इतिहासकारों के अनुसार
’रहली का ‘‘भगवान विठ्ठल देव’’ का मंदिर पेशवाई काल के अंतिम समय मे खेर परिवार की रानी ‘‘लक्ष्मीबाई खेर’’ ने सन - 1790 ई. में एक विशाल मन्दिर बनवाया था। महाराष्ट्र के पंढरपुर की तर्ज पर बना यह मंदिर ‘मध्य एवं उत्तर भारत’ के भगवान विठ्ठल के भक्तों को दर्शनों के लिए बनवाया गया था। रहली के सूर्य मंदिर में विराजमान सूर्यदेव की प्रतिमा की दिव्यता और सौम्यता झलकती है। सूर्यदेव कमलपुष्प पर खड़े हुए हैं उनके दोनों हाथों में सनाल पुष्प हैं। भगवान सूर्यदेव हाथों में शंख, चक्र, गदा, पदम् धारण किये हैं। पाषाण प्रतिमा में सूर्यदेव किरीट, मुकुट, मकर, कुंडल, मुक्ताहार, कवच, कंकड़, वक्षबन्ध, यज्ञउपवीत, कटिसूत्र, करधनी, लम्बे जूते आदि धारण किये हुए है। सूर्य प्रतिमा के पीछे प्रभामण्डल बना हुआ है तथा मध्य में महाश्वेता देवी अभयमुद्रा में हैं। महाश्वेता देवी के दोनों ओर सूर्यदेव की दोनों पत्नियाँ हैं। अरुण को रथ हाँकते हुए दिखाया गया है, अरुण के दोनों ओर कुबेर और वैश्रवण हैं। मालाधारी विद्याधर तथा परिचकाएँ इस प्रतिमा में सुंदर प्रतीत होती हैं।

मन्दिर में भगवान सूर्य की लगभग पांच फुट की खड़े में अत्यंत प्राचीन दिव्य प्रतिमा विराजमान है, जिसमें भगवान सूर्य, किरीट, मुकुट, मकर, कुंडल, मुक्ताहार, कवच, कंकड़, वक्षबन्ध, यग्योपवीत, कटिसूत्र धारण किये हैं, जिसे विगत कुछ वर्षों पहले असमाजिक तस्करों ने चुरा लिया था, लेकिन पुलिस-प्रशासन की अद्भुत सक्रियता के कारण अनमोल, दिव्य प्रतिमा को प्राप्त कर उसी जगह पुनः प्राण-प्रतिष्ठित किया गया। मंदिर परिसर में प्रदक्षिण पथ, नटराज, उमा महेश्वर, स्थानक गणेश, नृत्य गणेश,नाग युग्म, कुबेर, त्रिमुखी ब्रम्हा, चतुर्भुज लक्ष्मी, सरस्वती, के अलावा शैव, वैष्णव, शाक्य, तथा गणपति सम्प्रदाय की प्रतिमाएं स्थापित हैं, जिसे सुर, सुंदरी, अग्नि, वरुण, वायु, इंद्र आदि प्रमुख हैं। इस अद्भुत दिव्य स्थल को संरक्षित और जीर्णोद्धार के माध्यम से पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।

मंदिर परिसर में प्रदक्षिण पथ, नटराज, उमा-महेश्वर, नृत्य गणेश, स्थानक गणेश, कुबेर, नागयुग्म, त्रिमुखी ब्रम्हा, चतुर्भुज लक्ष्मी, सरस्वती, इंद्र, अग्नि, वरुण, वायु, शार्दूल,  सुर-सुंदरी, सहित शैव, वैष्णव, गणपत्य सम्प्रदाय की मनोहारी प्रतिमाएँ हैं। सूर्य मंदिर के पृष्ठ भाग में जड़ी हुई नागयुग्म की अत्यंत सुंदर एवं महत्त्वपूर्ण प्रतिमा है, नागयुग्म प्रतिमा का ऊपरी भाग मानव का तथा अधोभाग सर्प का है, जो परस्पर गुथे हुए हैं। दोनों के हाथ अंजलि के समान जुड़े हुए हैं, और सिर के ऊपर तीन-तीन फनों का छत्र है। नागयुग्म को भी मुकुट, कुंडल, हार, बाजूबंद, कंकड़, करधनी से सजाया गया है। दोनों के मुख पर सौम्य भाव है। नागयुग्म प्रतिमा के निचले भाग में बड़े आकार का बिच्छू अंकित है जो इस प्रतिमा की विशेषता भी है।

भोर होते ही सुनार नदी की कलकल करती हुई धाराप्रवाह के समक्ष पूर्वाभिमुख सूर्य प्रतिमा पर भगवान सूर्य की पहली किरण पड़कर अत्यंत मनोहारी दृश्य सृजन करतीं हैं। रहली का सूर्य मंदिर पुरातत्व विभाग के अंतर्गत है। कुछ वर्षों पहले कुछ असामाजिक तत्वों ने अमूल्य प्रतिमा को चुरा लिया था, जिसके बाद स्थानीय पुलिस- प्रशासन की जागरूकता के कारण प्रतिमा को प्राप्त पुनः यथास्थान प्राण प्रतिष्ठित किया गया। रहली की इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षा एवं संरक्षण की आवश्यकता है जिससे इस दिव्य स्थान को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।

सूर्यदेव का महत्व

सूर्य, प्रत्यक्ष देवता हैं, इन्ही के द्वारा दिन और रात का सृजन होता है। सूर्य ग्रहों के स्वामी हैं। ज्योतिष के अनुसार सूर्य, सिंह राशि के भी स्वामी हैं। शास्त्रों के अनुसार सूर्य देव की दो पत्नियाँ हैं- संज्ञा एवं छाया। यमदेव, यमुना, शनिदेव, सूर्यदेव की संतानें हैं। सूर्यदेव, पनवपुत्र, रामभक्त हनुमान के गुरु भी हैं। सूर्य आत्माकारक ग्रह हैं। यह स्वास्थ्य, राज्यसुख, सत्ता, ऐश्वर्य, वैभव, अधिकार आदि प्रदान करते हैं। सूर्य का प्रभावकारी रत्न माणिक है । सूर्य ग्रह की शांति के लिए सोना, ताँबा, गुड़, लाल मिठाई, लाल वस्त्र एवं लाल वस्तुएँ दान की जातीं हैं, सूर्यदेव की पूजन का सर्वोत्तम दिन रविवार है। ताँबे के पात्र में जल के साथ लाल चंदन एवं लाल पुष्प से सूर्यदेव के तेरह मन्त्रों से अर्ध्य दिया जाता है।