अपने सांस्कृतिक वैभव की कहानी बताता महोबा

अपने सांस्कृतिक वैभव की कहानी बताता महोबा

महोबा ऐतिहासिक, राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों में अपनी अलग और महत्वपूर्ण पहचान रखता है। बशर्ते मौजूदा समय मे सियासत और समाज को इसका तनिक भी ख्याल नहीं है। ऐतिहासिक और सामाजिक साक्ष्यों और निशानियों को सहेजने की उत्सुकता न तो मौजूदा युवा पीढी में है और पर्यटन क्षेत्र के तौर पर इसका नाम पूरे विश्व मे जाना जाए ऐसी सियासी जबावदेही भी नही। कुल मिलाकर हाल फिलहाल पौराणिक काल मे कभी महोत्सव नगर के नाम से जाना जाने वाला आज का महोबा न जाने कहाँ गुम होता जा रहा है ! कभी यहां विभिन्न प्रकार के महोत्सवों का आयोजन हुआ करता था तो आज एक अदद महोत्सव की आशा में सियासी हलक सूखते नजर आ रहे हैं। आल्हा-ऊदल जैसे वीर योद्धाओं की जन्मभूमि महोबा आज बुंदेली विरासत की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। कवि जगनिक ने अपने काव्य में आल्हा-ऊदल की वीरता का बखान करते हुए लिखा है - 

‘‘जा दिन जनम लियो आल्हा ने, धरती धंसी अढ़ाई हाथ’’

यहाँ की हर छोटी से छोटी चीज समूचे बुन्देलखण्ड को जोड़ती है। बुन्देली विरासत का यह अमूल्य भाग आज सरकारी उपेक्षा का शिकार है। यहाँ कई ऐसे स्थान हैं जिनको भली भांति संरक्षित करके इस बुन्देली विरासत को बचाया जा सकता है।

चन्द्रिका देवी मन्दिर
विख्यात 51 शक्तिपीठों में से एक मुख्यालय स्थित शक्तिपीठ माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर में नौ देवियों के मन्दिर बनवाने का संकल्प लिया गया है। यह मन्दिर महोबा में स्थित है। मन्दिर समिति ने निर्माण कार्य शुरू करा अगली नवरात्रि तक यहां भगवती के सभी नौ स्वरूप स्थापित करने की योजना बनायी है।

चन्द्रिका देवी मन्दिर में माँ भगवती की विशाल प्रतिमा अत्यंत भव्य आकर्षक है। हजारों देवी भक्त मानते है कि ग्रेनाइट शिला पर उत्कीर्ण हजारों वर्ष पुरानी माँ चन्द्रिका देवी की यह प्रतिमा दिन में 16 कलाएं बदलती है। इसे परखने के लिये सैकड़ों भक्त दिन में कई बार उनका दर्शन करने जाते है।

शिव तांडव मन्दिर
जैसा कि नाम से ही साफ है, यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है। महोबा जिले में गोरख या गुखार पर्वत के पास स्थित इस मन्दिर में तांडव नामक नृत्य मुद्रा में भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा है। इस प्रतिमा को काले ग्रेनाइट के एक ही पत्थर से बनाया गया है। मन्दिर के बगल में ही एक झरना है, जिससे दूधिया सफेद पानी गिरता है। यह पानी गोरख पर्वत से नीचे आता है। तांडव नृत्य मुद्रा में शिव की प्रतिमा इस क्षेत्र का एक दुर्लभ दृश्य है। मन्दिर के बगल में ही शिव तांडव का एक कुआं भी है।

चरखारी
यूपी के पहले वजीरे आला जनाब गोविन्द वल्लभ पंत जब चरखारी तशरीफ लाये तो चरखारी का वैभव एवं सौन्दर्य देखकर उनके मुँह से अचानक निकल पड़ा कि अरे यह तो बुन्देलखण्ड का कश्मीर है। चरखारी उन्हें इतना प्रिय था कि आजादी के बाद रियासतों के विलीनीकरण के समय जब चरखारी की अवाम ने म.प्र. में विलय के पक्ष में अपना निर्णय दिया तो पं. गोविन्द वल्लभ पंत सिर के बल खड़े हो गए। तत्काल चरखारी के नेताओं को बुलावा भेजा, महाराज चरखारी से गुफ्तगू की और इस प्रकार बुन्देलखण्ड का कश्मीर मध्यप्रदेश में जाने से बच गया।

पंत जी ने चरखारी को कश्मीर यूँ ही नहीं कह दिया था। राजमहल के चारों तरफ नीलकमल और पक्षियों के कलरव से आच्छादित, एक दूसरे से आन्तरिक रूप से जुड़े - विजय, मलखान, वंशी, जय, रतन सागर और कोठी ताल नामक झीलें चरखारी को अपने आशीर्वाद के चक्रव्यूह में लपेटे कृष्ण के 108 मन्दिर - जिसमें सुदामापुरी का गोपाल बिहारी मन्दिर, रायनपुर का गुमान बिहारी, मंगलगढ़ के मन्दिर, बख्त बिहारी, बाँके बिहारी के मन्दिर तथा माडव्य ऋषि की गुफा और समीप ही बुन्देला राजाओं का आखेट स्थल टोला तालाब - ये सब मिलकर वाकई चरखारी में पृथ्वी के स्वर्ग कश्मीर का आभास देते हैं। चरखारी का प्रथम उल्लेख चन्देल नरेशों के ताम्र पत्रों में मिलता है। देववर्मन, वीरवर्मन, हम्मीरवर्मन के लेखों में इसका नाम वेदसाइथा था। राजा परमाल के पुत्र रंजीत ने चरखारी को अपनी राजधानी बना चक्रधारी मन्दिर की स्थापना की। चक्रधारी मन्दिर के नाम पर ही राजा मलखान सिंह के समय वेदसाइथा का नाम चरखारी पड़ा। कुछ स्थानीय लोग इसे महराजपुर भी कहते हैं। कजली की लड़ाई में जब रंजीत मारे गए तो चरखारी उजाड़ हो गई। इन्हीं रंजीत के नाम पर किले के सामने रंजीता पर्वत है। एपीग्राफिक इंडिका के अनुसार खंदिया मुहल्ला और टोला तालाब इन्हीं रंजीत का बनवाया हुआ है। टोला ताल आज एक खूबसूरत पिकनिक स्पाॅट है।

चन्देलों के गुजर जाने के सैकड़ों वर्ष बाद राजा छत्रसाल के पुत्र जगतराज के समय चरखारी का पुनः भाग्योदय होता है। आखेट करते समय जगतराज एक दिन मुंडिया पर्वत पहुँचे। वहाँ उन्हें चुनूबादे और लोधी दादा नामक दो सन्यासी मिले। उन्होंने बताया कि वो दोनों यहाँ एक हजार वर्ष से तप कर रहें हैं और मुंडिया पर्वत ही ऋषि माण्डव्य की तपोस्थली है। जगतराज को इसी समय एक बीजक मिला जिसमें लिखा था-

‘‘उखरी पुखरी कुड़वारो वरा, दिल्ली की दौड़ मारे गुढ़ा, सो पावै नौ लाख बहत्तर करोड़ का घड़ा’’

जगतराज को एक दिन लक्ष्मी जी ने स्वप्न में आदेश दिया कि मुंडिया पर्वत सिद्धस्थल है। यहाँ मंगलवार को किले का निर्माण करो। मंगलवार को नींव का प्रारम्भ नहीं होता किन्तु लक्ष्मी जी का आदेश शिरोधार्य कर मंगलवार को किले की नींव खोदी गई। अतः इसका नाम मंगलगढ़ पड़ा। ज्येतिषी पुहुपशाह, कवि हरिकेश और मड़ियादो के पं गंगाधर के निर्देशन में किले को भव्य बनाने की कोशिशें दिन-रात चलती रहीं।

यह किला भूतल से तीन सौ फुट ऊँचा है। किले की रचना चक्रव्यूह के आधार पर की गई है। क्रमवार कई दीवालें बनाई गई हैं। मुख्यतः तीन दरवाजें हैं। सूपा द्वार - जिससे किले को रसद हथियार सप्लाई होते थे। ड्योढ़ी दरवाजा - राजा रानी के लिये आरक्षित था। इसके अतिरिक्त एक हाथी चिघाड़ फाटक भी मौजूद था।

किले के ऊपर एक साथ सात तालब मौजूद हैं - बिहारी सागर, राधा सागर, सिद्ध बाबा का कुण्ड, रामकुण्ड, चैपरा, महावीर कुण्ड, बख्त बिहारी कुण्ड। चरखारी किला अपनी अष्टधातु तोपों के लिये पूरे भारत में मशहूर था। इसमें धरती धड़कन, काली सहाय, कड़क बिजली, सिद्ध बख्शी, गर्भगिरावन तोपें अपने नाम के अनुसार अपनी भयावहता का अहसास कराती हैं। इस समय काली सहाय तोप बची है जिसकी मारक क्षमता 15 किमी है। ये तोपें 3 बार दागी जाती थीं, प्रथम- 4 बजे लोगों को जगाने के लिये, दूसरी 12 बजे लोगों के विश्राम के लिये, तीसरी रात में सोने के लिये। तीसरी तोप दागने के बाद नगर का मुख्य फाटक बन्द कर दिया जाता था और लोगों का आवागमन बन्द कर दिया जाता था।

चरखारी अपनी साहित्यिक प्रतिभाओं के लिये भी जानी जाती है। हरिकेश जी महाराज जगतराज के राजकवि थे। जगतराज इनकी पालकी में कन्धा देते थे। इनकी लिखी पुस्तक ‘दिग्विजय’ बुन्देलों का जीवन्त इतिहास है। खुमान कवि तथा आगा हश्र कश्मीरी ने चरखारी में रहकर अपनी चमक बिखेरी। आगा हश्र कश्मीरी ने कुल 44 पुस्तकें लिखीं जिनमें 18 नाटक है। नाथूराम, ख्यालीराम तथा मिर्जा दाउद बेग - जिन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का हिन्दी अनुवाद किया, सुप्रसिद्ध पखावज व मृदंग वादक कुंवर पृथ्वी सिंह दाउ, विख्यात कव्वाल फैज अहमद खां, संगीतज्ञ उम्मेद खां, सारंगी वादक स्वामी प्रसाद चरखारी की अन्यतम विभूतियाँ हैं।

जिले में पौराणिक स्थलों का अलग महत्व है। कभी दिल्ली, कन्नौज और महोबा की रियासतों के केन्द्र रहे एट थाना क्षेत्र का बैरागढ़ अकोढ़ी में दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चैहान और महोबा के आल्हा, ऊदल की आखिरी लड़ाई हुई थी। मान्यता है कि आल्हा को माँ शारदा का आशीर्वाद प्राप्त था। लिहाजा पृथ्वीराज चैहान की सेना को पीछे हटना पड़ा। माँ के आदेशानुसार आल्हा ने अपनी सांग (हथियार) यहीं मन्दिर पर चढ़ाकर नोक टेढ़ी कर दी थी। जिसे आज तक कोई सीधा नहीं कर पाया है। मन्दिर परिसर में ही तमाम ऐतिहासिक महत्व के अवशेष अभी भी आल्हा व पृथ्वीराज चैहान की जंग की गवाही देते हैं। एट से आठ किलोमीटर दूर माँ शारदा में श्रद्धालुओं का तांता लगा था। साधक तंत्र साधना में लीन थे। पुजारी शारदा शरण ने बताया कि उनके पूर्वज 1433 ईसवी से मन्दिर की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। माँ शारदा शक्ति पीठ का उल्लेख दुर्गा सप्तसती में भी है। आचार्य श्याम जी दुबे ने बताया कि मान्यता है कि पृथ्वी की मध्य धुरी बैरागढ़ में है। माँ की मूर्ति की किसी ने स्थापना नहीं की है। यह जमीन अपने आप ही उदय हुई है। जब महोबा के राजा परमाल के ऊपर पृथ्वीराज चैहान की सेना ने हमला किया तो उनके वीर योद्धा आल्हा ने पृथ्वीराज चैहान से युद्ध के लिए बैरागढ़ में ही डेरा डाल रखा था। यहीं वह पूजा अर्चना करने आए तो मां ने साक्षात दर्शन देकर उन्हें युद्ध के लिए सांग दी। काफी खून खराबे के बाद पृथ्वीराज चैहान की सेना को पीछे हटना पड़ा। युद्ध से खिन्न होकर आल्हा ने मन्दिर पर सांग चढ़ाकर उसकी नोक टेढ़ी कर वैराग्य धारण कर लिया। मान्यता है कि माँ ने आल्हा को अमर होने का वरदान दिया था। लोगों की माने तो आज भी कपाट बंद होने के बावजूद कोई मूर्ति की पूजा कर जाता है। बहरहाल आस्था व शक्ति की प्रतीक मां शारदा के हर नवरात्रि पर लाखों लोग दर्शन कर मन्नतें मांगते हैं।

चरखारी का 150 वर्ष पुराना गोवर्धन मेला 
बुन्देलखण्ड का कश्मीर कहे जाने वाले कस्बा चरखारी को मिनी वृंदावन भी कहा जाता है। इस कस्बे में भगवान कृष्ण के 108 मन्दिर है और कस्बे के चारों ओर पानी से भरे तालाब है। दिवाली त्यौहार के बाद होने वाले इस मेले का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। 1883 में कृष्ण भक्त चरखारी रियासत के राजा मलखान जूदेव ने गोवर्धन मन्दिर की स्थापना की थी। इस मन्दिर में भगवान राधा-कृष्ण अष्टधातु की मूर्ति स्थापित है। दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा से शुरू होकर एक माह चलने वाले मेले को लेकर चरखारी में कृष्ण भक्तों का भारी हुजूम उमड़ पड़ा है। कृष्ण और राधा की मूर्ति को रथ में सवार कर मेला मन्दिर स्थापित किया गया। दरअसल, बुन्देलखण्ड का सबसे प्राचीन मेले की शुरुआत करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व हुई थी। चरखारी रियासत के राजा मलखान जूदेव ने इसे आरम्भ कराया था। उन्होंने नगर में 108 कृष्ण मन्दिर, आकर्षक झीलों और सरोवरों की स्थापना कराई थी। बुन्देलखण्ड के महत्वपूर्व पर्यटक स्थलों में से चरखारी वैभव किलों और रियासत कालीन भवन पर्यटकों के आकर्षण का भी केन्द्र है। 

गोरखगिरी पर्वत
महोबा स्थित गोरखगिरी पर्वत एक खूबसूरत पिकनिक स्थल है। इसी पर्वत पर गुरू गोरखनाथ कुछ समय के लिए अपने शिष्य सिद्धो दीपक नाथ के साथ ठहरें थे। इसके अलावा यहां भगवान शिव की नृत्य करती मुद्रा में एक मूर्ति भी है। प्रत्येक पूर्णिमा के दिन यहां गोरखगिरि की परिक्रमा की जाती है।

सूर्य मन्दिर
सूर्य मन्दिर राहिला सागर के पश्चिम दिशा में स्थित है। इस मन्दिर का निर्माण राहिला के शासक चन्देल ने अपने शासक काल 890 से 910 ई. के दौरान नौवीं शताब्दी में करवाया था। इस मन्दिर की वास्तुकला काफी खूबसूरत है।

ऐतिहासिक अजेय दुर्ग ‘मंगलगढ़’ का रहस्य
समूचे भारत वर्ष के अतीत में अगर हम झांकने की कोशिश करें तो हम पायेंगे ऐसे बहुत ही कम अजेय दुर्ग रहे हैं जिन्हें कोई भी आक्रांता कभी जीत नही पाया। ऐसे ही दुर्गों में से एक था चरखारी का ऐतिहासिक ‘मंगलगढ़’ का अजेयदुर्ग । इसकी चर्चा तब सूदूर देशों में खूब होती थी । इसका निर्माण बुन्देलखण्ड केसरी के नाम से जाने जाने वाले महाराजा छत्रसाल के द्वितीय पुत्र महाराजा जगतराज (जिन्हें जैतपुर का राज्य दिया गया था) ने कराया था । मौजूदा समय मे यह दुर्ग पिछले दो दशक के लंबे समय से सेना के कब्जे में है । गाहे बगाहे स्थानीय जनता की यह मांग मुखर होती दिखती है कि इस दुर्ग को पर्यटन दृष्टि से आम जनमानस के लिए खोला जाये लेकिन फिलहाल सरकार के कान में जूं तक नही रेंग रही ।

इस दुर्ग के निर्माण के बारे में तमाम तरह के तर्क इतिहासकारों द्वारा दिये जाते रहे हैं और आज भी ये सिलसिला बदस्तूर जारी है लेकिन यह किला वास्तव में तीन सौ वर्षो से अधिक समय पुराना है। इस किले की नींव महाराजा जगतराज ने जरूर रखी लेकिन इसका निर्माण इस राजवंश की कई पीढ़ियों ने कराया। कहा जाता है कि महाराजा जगतराज को चरखारी में ही स्थिति एक ऊंचे पहाड़ में खूब सारा धन प्राप्त हुआ था जो कि चंदेल राजाओं का था। इसी धन से उन्होंने इस विराट किले का निर्माण कराया और बाकी का धन दान भी किया।

मंगलगढ़ किले कि विशेषता
यह पर्वत भूतल से लगभग 300 से 325 फुट की खड़ी ऊंचाई पर कठोर चट्टानों के है। पर्वत का पूर्व नाम मुड़ियागिर था क्योंकि इसके ऊपर लगभग 30 एकड़ का पूरा क्षेत्र समतल है तथा इस पर्वत पर प्रोंत रूप से निर्मित छोटे-बड़े सात तालाब हैं। दुर्ग की सबसे बड़ी विशेषता है कि तत्कालीन वास्तुकारों ने दुर्ग की रचना चक्रव्यूह के आधार पर की है। धरातल से 300 फुट ऊंचे व लगभग 30 एकड़ समतल पर्वत पर चारों ओर 25 फुट ऊंचा व 8 फुट चैड़ा परकोटा पत्थर व चूना का बना है। बताया जाता है कि इस किले में सुरक्षा की दृष्टि से पांच प्रकार की तोपें रखी होती थीं - धरती धमकन, काली सहाय, कड़क बिजली, सिद्ध बक्स और गर्भ गिरावन। इनमे से मौजूदा समय में सिर्फ एक ही सहाय तोप शेष बची है जो दर्शनीय है। इसकी मारक क्षमता 15 किमी है। अंतिम बार तोपें 1947 में चलाईं गई थी जब तत्कालीन महाराजा जयेंद्र सिंह जू देव को अख्तयार दिये गये थे तो बुन्देलखण्ड के आमंत्रित राजाओं एवं पाॅलिटिकल एजेंट के आगमन पर सलामी में एक ही दिन में कुछ घण्टों में लगभग 120 बार तोपें दागी गई थीं। चरखारी का ये मंगलगढ़ किला सुरक्षा की दृष्टि से अभेद है इसी कारण अजेय रहा है।

मंगलगढ़ किले को आमजन लोगो के लिए भी खोला जाना चाहिए !
चरखारी में रहने वाले आम जनमानस मानते हैं कि यह किला पर्यटन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है और इसे सबके दर्शन के लिए खुला हुआ चाहिए। लेकिन विगत कई दशक से यह किला सेना के कब्जे में है कि बार लोगो ने मांग की लेकिन फिलहाल अभी तक इसे आम लोगो के लिए नही खोला गया है।  विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यटन की दृष्टि से ऐसे पुराने किले बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं लेकिन सरकार की असवेंदनशीलता के चलते ये किला सिर्फ सन्नाटे की ही भेंट चढ़ा हुआ है। 

क्या यहाँ छिपा है कोई बड़ा खजाना 
गाहे बगाहे यह चर्चा भी आम रहती है कि क्या यहाँ सेना द्वारा किसी प्रकार का कोई गुप्त कार्य किया जा रहा है जैसे कोई असलहा, बारूद या कोई अन्य फैक्ट्री या फिर कुछ और ....... कुछ लोगो का तो यहाँ तक कहना है कि यहाँ बहुत बड़ा खजाना छुपा है जिसकी देखरेख के लिए सेना ने इसे अपने कब्जे में कर रखा है । फिलहाल सच्चाई जो भी हो लेकिन जिस तरह से वर्षो से सेना इसे अपने कब्जे में ले रखा है उससे कई प्रकार के सवाल खड़ें होते हैं। किले के चारो तरफ अजीब प्रकार का सन्नाटा पसरा रहता है। जहां पर्यटकों के आने से ये स्थान हर समय शोभायमान रहना चाहिए था वो अजीब सा शांत है।
पर्यटन के क्षेत्र में अपार संभावनाओं के बाद भी उपेक्षित बुंदेली माटी की तकदीर और तस्वीर अब बदलने वाली है। साहित्य, आध्यात्म और शौर्य पराक्रम की गाथाओं के रूप में विरासत की थाती सहेजे बैठे बुन्देलखण्ड को पर्यटन के नक्शे में सितारे की तरह चमकाने की खातिर प्रदेश सरकार ने बुन्देलखण्ड सर्किट के रूप में इसे संवारने का खाका तैयार किया है। सूबे की पर्यटन मंत्री ने इसका खुलासा करते हुए कहा कि प्रदेश सरकार के साथ ही बुन्देलखण्ड को पर्यटन के रूप में विकसित करने के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दृष्टि भी लगी हुई है।

आल्हा-ऊदल-सदृश वीर जिसने उपजाये, 
जिनके साके देश विदेशों ने भी गाये,
वही ‘जुझौती’ जिसे बुन्देलों ने अपनाया,
इससे नाम ‘बुन्देलखण्ड’ फिर जिसने पाया,
पुरावृत्त से पूर्ण, परम प्रख्यात भूमि है।
यह इतिहास-प्रसिद्ध, शौर्य-संघात भूमि है।। 

- श्री प्रेम बिहारी ‘अजमेरी’ (प्रेम पयोनिधि से)