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आज़ाद भारत में आज भी ब्रिटीशों की गुलाम है शकुन्तला

हमारे देश को आजाद हुये आज 70 वर्ष हो चुके है और 15 अगस्त 2017 को हम 71 वें स्वतंत्रता वर्ष में प्रवेश कर रहे है। हम हर वर्ष अपनी आजादी का ये राष्ट्रीय पर्व बड़ी ही धूम-धाम से मनाते है।

लेकिन हम आज भी कहीं न कहीं गुलामी की जंजीरों के बंधे हुये है जी हाँ! अंग्रेजों को भारत छोड़े पूरे 70 साल हो गए लेकिन आज भी गुलामी की एक निशानी हमारे देश में मौजूद है। आज भी भारत का एक रेलवे ट्रैक ब्रिटेन के कब्जे में है। महाराष्ट्र (नैरो गेज, छोटी लाइन) में एक रेलवे लाइन ऐसी भी है, जिसका मालिकाना हक भारतीय रेलवे के पास नहीं है। ब्रिटेन की एक निजी कंपनी इसका संचालन करती है। यवतमाल से मुर्तिजापुर के बीच बनी नैरो गेज लाइन की शुरुआत अंग्रेजी राज में हुई थी।

शकुंतला रेलवे के नाम से चल रही इस लाइन पर ब्रिटिश काल में ग्रेट इंडियन पेनिन्सुलर रेलवे द्वारा ट्रेनों का संचालन होता था। उस वक्त यह कंपनी मध्य भारत में ट्रेनों के संचालन का काम देखती थी। 1952 में जब रेलवे का राष्ट्रीयकरण किया गया, तब इस लाइन को नजरअंदाज कर दी गई। आज भी इस लाइन का संचालन ग्रेट इंडियन पेनिन्सुलर रेलवे के हाथ में ही है। शकुंतला रेलवे की स्थापना निजी ब्रिटिश फर्म किलिक निक्सन ने 1910 में की थी। कंपनी ने ब्रिटिश सरकार के साथ जॉइंट वेंचर में काम शुरू किया और सेंट्रल प्रोविंस रेलवे कंपनी बनाई थी।

शकुंतला एक्सप्रेस के कुछ जानकारी...

  • इस रेल ट्रैक पर शकुंतला एक्सप्रेस के नाम से सिर्फ एक पैसेंजर ट्रेन चलती है।
  • अमरावती से मुर्तजापुर के 189 किलोमीटर के इस सफर को यह 6-7 घंटे में पूरा करती है।
  • अपने इस सफर में शकुंतला एक्सप्रेस अचलपुर, यवतमाल समेत 17 छोटे-बड़े स्टेशनों पर रुकती है।
  • 100 साल पुरानी 5 डिब्बों की इस ट्रेन को 70 साल तक स्टीम का इंजन खींचता था। इसे 1921 में ब्रिटेन के मैनचेस्टर में बनाया गया था।
  • 15 अप्रैल 1994 को शकुंतला एक्प्रेस के स्टीम इंजन को डीजल इंजन से रिप्लेस कर दिया गया।
  • इस रेल रूट पर लगे सिग्नल आज भी ब्रिटिशकालीन हैं। इनका निर्माण इंग्लैंड के लिवरपूल में 1895 में हुआ था।
  • 7 कोच वाली इस पैसेंजर ट्रेन में प्रतिदिन एक हजार से ज्यादा लोग ट्रेवल करते हैं।
  • इंडियन रेलवे हर साल एक करोड़ 20 लाख की रॉयल्टी ब्रिटेन की एक प्राइवेट कंपनी को देनी पड़ती है।
  • इस रूट पर चलने वाली शकुंतला एक्सप्रेस के कारण इसे 'शकुंतला रेल रूट' के नाम से भी जाना जाता है।
  • अमरावती का इलाका अपने कपास के लिए पूरे देश में फेमस था। कपास को मुंबई पोर्ट तक पहुंचाने के लिए अंग्रेजों ने इसका निर्माण करवाया था।
  • 1903 में ब्रिटिश कंपनी क्लिक निक्सन की ओर से शुरू किया गया रेल ट्रैक को बिछाने का काम 1916 में जाकर पूरा हुआ।
  • 1857 में स्थापित इस कंपनी को आज सेंट्रल प्रोविन्स रेलवे कंपनी के नाम से जाना जाता है।
  • ब्रिटिशकाल में प्राइवेट फर्म ही रेल नेटवर्क को फैलाने का काम करती थी।
  • 951 में भारतीय रेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। सिर्फ यही रूट भारत सरकार के अधीन नहीं था।

 



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