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बाबू जी ! ईं चार महीना हमैं कौनो से मदद के आस नाही, जबै मर जाब तबै सब अइहैं

बरसात का मौसम आ गया है। पानी भी लगातार बरस रहा है। एक तरफ किसान काफी खुश हैं कि अगर पानी अच्छा हो जायेगा तो खेती भी उतनी ही अच्छी होगी। लेकिन दूसरी तरफ ये पानी बहुत से विकास कार्यों और प्रशासन की कार्यशैली की भी पोल कर रहा है। बुन्देलखण्ड का पाठा क्षेत्र जो दशकों तक डकैतो के खौफ और आतंक के कारण विकास कार्यो से कोसो दूर रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कहने को तो बहुत विकास कार्य हुए हैं लेकिन पूरी तरह गुणवत्ता विहीन। विकास कार्यों के नाम पर लीपापोती। ऐसा ही एक सम्पर्क मार्ग है मानिकपुर से उंचाडीह जाने वाला जिसके बन जाने के बाद अब ग्रामीणों को काफी राहत है।

उंचाडीह से यही संपर्क मार्ग आगे चमरौहां, सकरौहां होते हुए रानीपुर गिदुरहा आदि गाँवो को जोड़ता है। उंचाडीह तक सड़क तो ठीक है लेकिन रपटे जस के तस हैं। लेकिन उंचाडीह से आगे का रास्ता भी बदहाल है और रपटे तो ऐसी स्थिति में है कि न जाने कब धंस जाये। सबसे ज्यादा दिक्कत रानीपुर गिदुरहा गांव को जोड़ने वाला पुल है जो धंस चुका है और बरसात बढ़ने से तमाम सेवाएं इस गांव से दूर हो जायेगीं।

प्रशासन का कहना है अब बरसात का मौसम आ गया है इसीलिए निर्माण कार्य सम्भव नही है लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि अब तक इन्तजार किस बात का किया जा रहा था ? सिर्फ इतना कह देने से आम लोगो के प्रति शासन और प्रशासन की प्रतिबद्धता खत्म नही हो जायेगी ।

"बाबू जी ! ईं चार महीना हमैं कौनो से मदद के आस नाही , जबै मर जाब तबै सब अइहैं"

ये शब्द उन ग्रामीणों के हैं जो शहर से दूर गाँवो में अपनी जिंदगी उतने ही शान और मजबूती से जी रहे हैं। ग्रामीण काफी दुखी हैं। उनका कहना है कि नेता और प्रशासन वाले यदा कदा आते तो जरूर हैं लेकिन उनके आने से किसी भी प्रकार की योजना या सुविधा का लाभ नही मिल पाता है। बड़ा ही हास्यापद विषय है जिस ग्रामीण जीवन को ऊपर उठाने की बात राष्ट्रपिता महात्मा गांधी किया करते थे उसका तो मौजूदा समय में एक रत्ती भी कार्य नही हो रहा है। गांव नही विकसित होंगे तो देश भी आगे नही बढेगा। दुःख की बात ये है कि गाँवों में जितने भी विकास कार्य होते हैं सबमे जमकर भृस्टाचार किया जाता है। करोड़ो अरबो रूपये डकार लिए जाते हैं शायद इसीलिए गाँव अब तक विकास की मुख्य धारा से कोसो दूर हैं।

आपको बता दें कि पिछले वर्ष बुन्देलखण्ड के इसी पाठा क्षेत्र में भयंकर बाढ़ आई थी जिसके कारण आम लोगो को काफी नुकसान हुआ था। फसल से लेकर मवेशियों तक का भारी नुकसान झेलना पड़ा यहाँ के लोगो को। यहाँ बाढ़ यदा कदा ही आती है क्योंकि पठारी भाग होने कारण यहाँ जो भी नदियां हैं वो पहाड़ी स्रोतों पर आधारित रहती हैं। यहाँ की सबसे बड़ी पहाड़ी नदी बरदहा है जिसने पिछली बार अपना रौद्र रूप दिखाया था। प्रशासन के लिए जितनी बड़ी चुनौती नदी का बढ़ता पानी था उससे ज्यादा यहाँ की सड़कों पर बने रपटे जो सड़क से कई फ़ीट नीचे बनाये गए हैं जिनसे बाढ़  के वक्त पानी करीब 4-8 फ़ीट ऊपर बहता है।

इसी कारण पिछली बार प्रशासन 24 घण्टे से भी ज्यादा समय तक उन स्थानों तक पहुंचने में नाकाम रहा था । कई रपटों के धंसने के कारण तो रास्ता भी बाधित हो गया था। मौजूदा जिलाधिकारी मोनिका रानी ने बाढ़ के बाद रपटे बनवाने के आदेश दिए थे लेकिन सिर्फ कुछ रपटों पर लीपापोती करके उन्हें उनके हाल में छोड़ दिया गया था।

अभी इस सम्पर्क मार्ग में कुछ ऐसे प्रमुख रपटे हैं जिनमे पिछली बार मिट्टी और पत्थर भर दिया गया था। अब पहले बारिश के पानी के साथ वो वो मिट्टी भी धसना शुरू हो गई है । बस कुछ दिन की और बात और उस रपटे के धसते ही आधा सैकड़ा गाँवों का शहर से संपर्क कट जायेगा। 

प्रशासन से लेकर जनप्रतिनिधि सभी ने पिछले वर्ष से अब तक सिर्फ वादे किए लेकिन वो तमाम वादे बीरबल की खिचड़ी बनकर रह गए। इन रपटों को सड़क से कई फ़ीट ऊपर बनना चाहिए जिससे पानी नीचे से बहकर निकल जाये। आम लोगो को इन रपटों के खस्ताहाल होने से इन तीन चार महीनों में भारी मुसीबत का सामना करना पड़ता है। मसलन चाहे स्वास्थ्य सेवा, बिजली व्यवस्था हो, जलापूर्ति हो, रोजमर्या की राशन सामग्री हो ये सभी व्यवस्थाएं ठप्प हो जाती हैं और हजारो ग्रामीणों के पास सिर्फ उम्मीदों का चमकता हुआ तारा भर टिमटिमाता रह जाता है। जिसकी ओर सभी टकटकी लगाए इस इन्तजार में बैठे रहते हैं कि अब होगा ! अब होगा !

About the Reporter

  • अनुज हनुमत

    5 वर्ष , परास्नातक (पत्रकारिता एवं जन संचार)

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