?> विदेशियों ने सहेजा आल्हा का शौर्य, अपनो ने भुलाया बुन्देलखण्ड का No.1 न्यूज़ चैनल । बुन्देलखण्ड न्यूज़ बुन्देलों के शौर्य का परिचायक वीर रस से ओतप्रोत जगनि"/>

विदेशियों ने सहेजा आल्हा का शौर्य, अपनो ने भुलाया

बुन्देलों के शौर्य का परिचायक वीर रस से ओतप्रोत जगनिक रचित आल्ह खण्ड को बुन्देलों ने तो विस्मृत कर दिया पर सात समुन्दर पार विदेशी धरती पर अंग्रेजों ने बुन्देलों के शौर्य की इस गाथा को बखूबी सहेजा है। बुन्देलखण्ड ही नही उत्तर भारत में चन्देलों के शौर्य की यह गाथा केवल सावन के महीने मे सुनाई देती है जबकि विदेशी इतिहास कार इसके छुये अनछुये पहलुओं की तलाश में लगातार लगे रहते हैै।

वर्ष 1864 में फर्रुखाबाद के कलेक्टर सीए इलियश ने पहली बार आल्हा सुना तो वह इससे बडे प्रभावित हुये और बाद में उन्होने अपने साथियों के सहयोग से जगनिक रचित आल्हखण्ड की सभी 52 लडाईयां संग्रहीत करा उन्हे विविध भाषाओं में लिपिवद्ध कराया। अंग्रेजों द्वारा लिपिवद्ध की गई यह प्रतियां आज भी आक्सफोर्ड युनीवर्सिटी के संग्रहालय व पुस्तकालय मे सुरक्षित है। जबकि जगनिक द्वारा लिखे गये परमाल रासों की मूल प्रति ब्रिटेन में राजकीय संग्रहालय में रखी है। विदेशी इतिहासकार इन्हें पढ गाहे बगाहे महोबा में आल्हा की गाथा में वर्णित संदर्भो का सत्यापन करने यहां आते रहते है।

वर्ष 1864 में फर्रुखाबाद के कलेक्टर सीए इलियश ग्रामीण भ्रमण पर निकले तो एक जगह भारी भीड देख रुक गये। पता करने पर उन्हें बताया गया कि यहां लोग आल्हा सुनने के लिये एकत्र हुये है। आल्हा के प्रति लोगों में अपार उत्साह देख उन्होने अपने बंगले में आल्हा गायकों का सम्मेलन करा दुभाषीय के जरिये उसका अर्थ भी समझा। आल्हा ऊदल के शौर्य की गाथा सुन वह बहुत ही प्रभावित हुये और अपने मित्र बंगाल के प्रशासनिक अधिकारी व इतिहासकार विलियम वाटर फील्ड के जरिये उन्होने आल्हा की सभी लडाईयों का अंग्रेजी में अनुवाद कराया।

बाद में जार्ज बियर्सन अरसन ने आल्हा की सम्पूर्ण लडाईयों का अध्यन कर ‘‘द ले आॅफ आल्हा’’ शीर्षक की पुस्तक लिखी। जिसका प्रकाशन आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी के मिलफोर्ड लंदन स्थित कार्यालय से सन 1923 में किया गया। यह पुस्तक महोबा में शरद तिवारी दाऊ के पास उपलब्ध है। कालान्तर में इंगलेण्ड के बिनसेन्ट स्मिथ ने ‘‘द ले आॅफ आल्हा’’ का बुन्देली में व जार्ज वियर्सन ने भोजपुरी में अनुवाद कराया।

इस तरह बुन्देलों के शौर्य के प्रतीक इस बुन्देली महाकाब्य पर बुन्देलखण्ड अथवा उत्तर प्रदेश में भले ही कुछ खाश नही किया जा सका परन्तु विदेशी इतिहासकारों ने इसके हर पहलू को छूने व उसे लिपि वद्ध करा जन सामान्य के लिये उपलब्ध कराने की दिशा में सार्थक योगदान किया है। अंग्रेजों द्वारा लिपिवद्ध कराई गई इन पुस्तकों को पढ बिदेशी सेलानी गाहे बगाहे आल्हा ऊदल की वीर गाथाओं से रुबरु होने महोबा आते रहते है।



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