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स्वास्थ्य मंत्री को नैतिक जिम्मेदारी के साथ इस्तीफा देना चाहिए

बच्चे देश का भविष्य होते हैं। कोई एक बच्चा देश का नेतृत्वकर्ता बनता है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक साथ दर्जनों मौत से स्वास्थ्य व्यवस्था से आम आदमी का विश्वास उठ जाना लाजिमी प्रतीत होता है।

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की दर्दनाक घटना सम्पूर्ण देश मे चर्चा का विषय बनी हुई है। आम आदमी बेहद आहत महसूस होता है। सर्वप्रथम आक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत की खबर प्रकाश मे आई। इसके बाद मौत, आंकड़े और कारण में मीडिया व सरकार व्यस्त नजर आई।

पूर्व में कितनी मौत हो गईं मायने ये नही रखता कि 2014 में 567, 2015 में 668 और 2016 में 587 मौत हुईं, बल्कि एक भी मौत इलाज के अभाव मे ना हो चर्चा इस पर होनी चाहिए।

कालेज प्रशासन को यह पता था कि सप्लायर कंपनी कभी भी आक्सीजन की सप्लाई रोक सकती है फिर भी बड़े स्तर पर इमर्जेंसी में इत्तला ना देना घोर असंवेदनशीलता को दर्शाता है।
खबर यह नही होनी चाहिए कि आक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत हो गई बल्कि खबर यह होनी चाहिए थी कि आक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत हो सकती है अथवा शीघ्र ही मेडिकल कालेज में आक्सीजन की पूर्ति पर विचार होना चाहिए। जिससे बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ ना हो।

लेकिन नकारात्मकता के दौर में जीने वाला हर वर्ग ऐसी खबर की प्रतीक्षा करता है कि मौत हो जाए फिर उस पर राजनीतिक घेराबंदी शुरू की जाए।

मीडिया एक तीसरी नेत्र है। जिसका काम होना चाहिए कि घटना घटने से पहले इंतजाम की खबर देनी चाहिए। अगर खबर ऐसी होती यकीनन आक्सीजन की व्यवस्था से आधा सैकड़ा बच्चों की जान से खिलवाड़ नही होता।

इस दौरान बेहद निराशाजनक बात यह रही कि जिस स्वास्थ्य मंत्री को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देना चाहिए, वो आंकडो के मदारी निकले। पूर्व मे हुई मौत का हवाला देकर इस घटना को सहज ही बताने की बेशर्मी में सिद्धार्थनाथ सिंह जब उतर आए तब ही कहते हैं कि "अंधेर नगरी चौपट राजा"।

जिन परिवार के मासूमो की मौत हुई है। आंकड़े उनके काम नही आयेगें। जिस माँ की गोद सूनी हुई है, उनकी गोद में आंकड़े किलकारी नहीं मार सकते हैं। आंकडो से सरकार चल सकती है, बच सकती है लेकिन मासूमो की मौत की जिम्मेदारी से बचा नही जा सकता है।

कालेज के प्रिंसिपल को बर्खास्त कर देने भर से काम कैसे चलेगा और प्रिंसिपल खुद कह रहे हैं कि नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया है। सच भी है कि सरकार द्वारा धन आवंटित किया गया, फिर भुगतान मे इतनी देर होने का महज कारण क्या हो सकता है ? इसके पीछे की किवदंती शायद कमीशनखोरी है कि लगभग 67 लाख से ज्यादा के भुगतान में प्रशासनिक अफसरों कि तिजोरी में कितना खजाना पहुंच सकता है ?

हमारे देश प्रदेश में सबसे बड़ी बीमारी यही है। कमीशन के जाल में बच्चों की मौत हुई होगी। कायदे से प्रदेश सरकार को इस पूरे मामले की सीबीआई जांच भी करानी चाहिए। साथ ही स्वास्थ्य मंत्री को नैतिक जिम्मेदारी के साथ इस्तीफा देना चाहिए।



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