जनश्रुतियों में आज भी जिन्दा हैं लोककवि ईसुरी

जनश्रुतियों में आज भी जिन्दा हैं लोककवि ईसुरी

@राकेश कुमार अग्रवाल

भाषा का विकास मानव सभ्यता की सतत् प्रक्रिया का अंग रहा है, जब तक भाषा विकसित नहीं हुई थी तब तक अभिव्यक्ति का माध्यम शारीरिक हाव-भाव ही रहे होंगे, भाषाओं के अस्तित्व में आने के बाद बोलचाल की भाषा को लिपिबद्ध करने की विकास यात्रा भी बड़ी अनूठी रही है। 

इस लम्बी यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया जब इंसान ने छापाखाना का आविष्कार किया। भावों व विचारों के सम्प्रेषण में और शिक्षण में बोलने, सुनने व कंठस्थ करने के उस दौर में बड़ी भूमिका होती थी। लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे रचनाकार व कवि भी हुए जिन्होंने कभी कागज-कलम को उठाकर विचारों व भावनाओं को लिपिबद्ध नहीं किया। लेकिन उनकी भावाभिव्यक्ति में इतनी धार रही है कि उनकी रचनाएं कालजयी हो गई हैं। 

बुन्देलखण्ड के लोककवि ईसुरी की यूं तो कोई लिपिबद्ध रचनावलियाँ मौजूद नहीं हैं लेकिन उनका ‘फाग गायन’ व उनकी ‘चैकड़ियाँ’ आज भी बुन्देली जनमानस में जीवन्त हैं। 

बचपन
लोककवि ईसुरी का जन्म सम्वत् 1898 की चैत्र शुक्ल दशमी को झाँसी की मऊरानीपुर तहसील के ग्राम मेड़की में हुआ था। बुन्देली भाषा के आशुकवि ईसुरी के पिता का नाम भोले व माँ का नाम गंगा था। ईसुरी की बाल्यावस्था में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया था, ऐसे में उनके लालन-पालन की जिम्मेदारी उनके मामा भूधर नायक ने निभाई जो लुहरगाँव में रहते थे। ईसुरी प्रसाद तीन भाईयों में सबसे बड़े थे। 

सोपान
उत्तर प्रदेश व मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित महोबा के ग्राम धौर्रा के मुसाहिब जंगजीत सिंह जूदेव के यहां रहकर ईसुरी ने कामदार पद पर कार्य किया। गंवई वेशभूषा में रहने वाले ईसुरी गौरवर्ण व इकहरे बदन के थे। स्वाभिमानी रहे ईसुरी को छतरपुर के महाराजा विश्वनाथ सिंह जूदेव ने एक रूपया प्रतिदिन पर उनके यहां रहने का न्यौता भेजा था, लेकिन ईसुरी ने अस्वीकार कर दिया था। 

धौर्रा में मुसाहिब जू की माँ के गहनों से भरे डिब्बे की चोरी का आरोप ईसुरी पर लगा था। जबकि आभूषण उनकी दासी ने चुराए थे। ईसुरी को चोरी के उस कथित आरोप पर नीम के पेड़ से उल्टा लटका दिया गया था। अपमान की आग में झुलसे ईसुरी ने इस पीड़ा को चैकड़िया के माध्यम से कुछ इस तरह व्यक्त किया था ...

“ रूकमन डब्बा काये न रानो, भेजो जहल खाने।
जो खा जाए खेत खों बारी, जेऊ इक बड़ौ आलानी तो।।”

वे कहते हैं ...
”मोरो जानों न ईसुर, गानो रूकमन को जानो।“

स्वाभिमानी ईसुरी ने उक्त इलजाम के बाद धौर्रा छोड़ दिया था। हालांकि आभूषण बाद में रूकमन से बरामद हो गए थे। ईसुरी पर मुकदमा भी चलाया गया था लेकिन तहसील में निर्णय उनके पक्ष में हुआ था। धौर्रा के मुसाहिब जंगजीत सिंह जूदेव की जमींदारी ग्राम बघौरा में भी थी, इसलिए उसकी देखरेख के लिए ईसुरी बघौरा आकर रहने लगे थे। बाद में जंगजीत सिंह जूदेव ने बघौरा निवासी फातिमा बीबी को जमींदारी बेच दी थी। ईसुरी का बघौरा में ऐसा मन लगा कि वह फातिमा बीबी के यहाँ नौकरी करने लगे। बताते हैं कि ईसुरी ने फाग गायिकी यहीं से शुरू की थी। उन्होंने एक फाग में फातिमा बीबी के यहाँ काम करने का जिक्र कुछ इस तरह किया ...

“जब लौं रहैं पवन से नीकै, आए गए सब ही के
बने बघौरा रात ईसुरी, कारिंदा बीबी के।”

ईसुरी की जबान पर सरस्वती कुछ इस तरह विराजमान थी कि वह सामान्य बोलचाल भी फाग के माध्यम से करते थे। वह कविता में ही बात करते थे। कविता में ही हाल-चाल पूँछते थे। उनके परम शिष्यों में ग्राम पडुआ जिला टीकमगढ़ निवासी धीरे पन्डा थे, जो साए की तरह हमेशा उनके साथ रहे। जो भी फागें ईसुरी मुखारबिन्द से निकालते थे, धीरे पन्डा उसको लिखते रहते थे। 

“जितनी फाग बनावें ईसुर, गावें धीरे पन्डा।”

ईसुरी की शादी बघौरा के निकटवर्ती ग्राम सीगौन के मिश्रा (ब्राह्मण) परिवार में हुई थी। उनकी बेटी का नाम गुरन था जिसकी शादी ग्राम धवार थाना महोबकंठ जिला महोबा में हुई थी। शादी के कुछ समय बाद ही गुरन विधवा हो गई थी। उन्होंने विधवा बेटी को कुछ इस तरह ढाढ़स बंधाया था ...
“जिदना गुरन तुम्हें अवतारो, सिर में अक्षर मारो 
बेई ईसुरी पार लगाहें, जिनने बनो-बिगारो।”

रचना संसार
बाल्यकाल में उनको जमुना प्रसाद रावत ने शिक्षा-दीक्षा दी। युवावस्था में लगभग 24 वर्ष की आयु में ईसुरी के मनोमस्तिष्क में काव्य कोपलें फूटीं। हालांकि उम्र का यह वह पड़ाव होता है जब एक युवा प्रेम व श्रृंगार की रचनायें ज्यादा रचता है, लेकिन ईसुरी का रचना संसार काफी विशद रहा है। 

सोरठा, दोहा, छंद व चैपाई के चर्चित रूपों के इतर ईसुरी ने चैकड़िया छन्द विधा के माध्यम से अभिव्यक्ति दी। चैकड़िया छन्द कहना आसान नहीं माना जाता। चैकड़िया चार पंक्तियों की होती हैं, जिसमें अधिकांश पंक्तियां 28 मात्राओं की होती है। 16 पर यति होता है। चैकड़िया छन्द के मूल में छन्द है, जिसमें 16 मात्रायें होती हैं। और दोहे के समचरण में 11 मात्राएं होती हैं। दोहे के समचरण को दीर्घ करने पर 12 मात्राएं हो जाती हैं, इस प्रकार 16$12 बराबर 28 मात्राओं का छन्द सार, छन्द कहलाता है, इसी छन्द को बाद में ललित व नरेन्द्र नाम दिए गए। छन्द प्रभाकर में सार छन्द के लक्षण का उल्लेख मिलता है। 

फाग गायन का सम्बन्ध आमतौर पर बसंत और फाल्गुन से माना जाता है, लेकिन ईसुरी ने इसे व्यापक फलक दिया है। बुन्देलखण्ड की गरीबी, निर्धनता व अकाल के हालातों को उनकी संवेदनशीलता ने कुछ यूं बयां किया है ...

“फांके परत दिना दो-दो के, परचन नइयां चूले।
मरे जात भंूकन के मारे, अंधरा, कनवा, लूले।।”

लगभग 175 वर्ष बाद भी ईसुरी की फागें बुन्देलखण्ड के आज के हालात पर अक्षरशः चरितार्थ हो रही हैं। बाबा आमटे व सुन्दरलाल बहुगुणा का प्रकृति प्रेम वर्तमान हालातों के मद्देनजर भले प्रासंगिक बन पड़ा है, लेकिन वृक्षों की कटान पर ईसुरी की चैकड़िया की धार देखिए ...

“इनपे लगे कुलरिया घालन, भऊआ मानस पालन।
इने काटवो न चइयत तो, काट देत जे कालन। 
ऐसे रूख भूंख के लाने, लगवा देय नन्दलालन। 
जे कर देत नई सी ईसुर, मरी मराई खालन।”

ईसुरी ने फाग गायकी को इस मुकाम तक पहुंचा दिया था कि उसे बुन्देलों का गहना कहा जाता है। 
“फागन कौ अनमोल खजानांे, बुन्देली को गानो”
 
ईसुरी की फागों में ऋतुओं का श्रृंगारिक वर्णन भी देखते ही बनता है। 
“अब रित आई बसन्त बहारन, पान फूल फल डारन। 
हारन हद्द पहारन, पारन, धाम, धवल जल धारन। 
कपटी-कुटिल कन्दरन धाई, गई बैराग बिगारन। 
चाहत हती प्रीत प्यारे की, हा हा करत हजारन। 
जिनके कन्त अन्त घर से हैं, तिन्हें देख दुख दारून। 
ईसुरी मौर झौंर के ऊपर, लगे भौंर गुुंजारन।”

श्रंृगार व रूप सौन्दर्य के वर्णन में जैसे ईसुरी रूपकों के नए प्रतिमान गढ़ते हैं। 
“डारी रूप नयन की फांसी, दै काजर विश्वासी। 
कोरन कोर डोर काजर की, मनमोहक के आंसी।।”

ईसुरी ने राधा-कृष्ण के प्रेम पर आधारित श्रृंगार को इस तरह अभिव्यक्ति दी।
“राधा आउत जात कुंवारी, दई बेचन गिरधारी। 
देव अगोट गैल गोकुल सी, मिल जाए प्रान पियारी।।”

रूप श्रंृगार को चैकड़िया में वह बड़े ही रोचक उपमानों में गढ़ते हैं। 
“जो कऊं छैल छला हो जाते, परे उंगरियन राते। 
भों पोछत गालन को लगते, कजरा देत दिखाते। 
घरी-घरी घूंघट घालत में, नजर सामने राते। 
ईसुर दूर दरस के लाने, ऐसे काये ललाते।।”

ईसुरी का नायिका को लेकर रोमांटिक रंग पैंजनों के माध्यम से रोम-रोम में प्रेम रस घोल देता है। 
“चलतन परत पैंजना छनके, पांवन गोरी धनके 
सुनतन रोम-रोम उढ़ आऊत, धीरज रहत न तन के।”

ईसुरी के जीवन में दो नर्तकियों गंगिया व सुन्दरिया का भी बड़ा प्रभाव रहा है। सुन्दरिया का जैसा नाम था वैसी ही वह खूबसूरत थी। ईसुरी ने उसकी खूबसूरती का वर्णन कुछ इस तरह किया है ... 
‘‘नैना तरबारन से पैने, करे सामने तेंने
घायल कर दओ मुलक भरे खों, ऐसी की की देनें।
प्रान हरन सुन्दरिया, गंगिया, एकई सी दोई वैने।
ऊसई पैंने नैन तुम्हारे कछु छलत है सैंने। 
‘ईसुर’ कात सामने होके, ये सासन भर मैंने।”

ईसुरी के रचना संसार की ‘रजऊ’ भी नायिका रही है। नायिका ‘रजऊ’ का उन्होंने ढेरों चैकड़ियों में जिक्र किया है। विरह वेदना में रजऊ को लेकर उन्होंने बिहारी, सूर व मलिक मोहम्मद जायसी से भी गहरे उपमान गढ़े हैं, इस चैकड़िया को ही देखिए ...
“हडरा घुन हो गए हमारे, सोचन रजऊ तुम्हारे। 
दौरी देह दूबरी हो गई, करके देख उगारे। 
गोरे अंग हते सब जानत, लगन लगे अब कारे। 
जो तन हो गयो छुआरो, उसइ हतो इकारो। ”

जिस तरह एक फिल्मी गीत में नायिका अपने पिया के रंगून जाने की बात करते हुए विरह वेदना को बयां करती है, लेकिन ईसुरी ने डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ही नायिका के विरह को कुछ यूं अभिव्यक्ति दी थी। 
“प्रीतम विलम विदेश रये री, दोऊ दृग नीर बये री। 
निपट अकेली निबल पाए दिन, अंग अनंग दहेरी। 
बागन और द्रमन, बन, बेलिन, कोयल सबद कहे री। 
ईसुर लख दुख विकल हो रई, सब सुख बिसर गये री।”

आध्यात्मिक दर्शन भी ईसुरी की चैकड़ियों में परिलक्षित होता है।
“बरवारी रइयत है भारे की, दई पिया प्यारे की। 
कच्ची भीत उठी माटी की, छाँह फूस चारे की।।”

भगवान राम उनके जीवन चरित्र व रामचरितमानस को वह इहलोक से परलोक को चैकड़िया के माध्यम से कुछ इस तरह बताते हैं ...
“रामें लये रागनी जी की, लगे सुनत में नीकी। 
छैअ शास्त्र पुरान अठारा, चार वेद से झींकी। 
गैरी मौत अथाह भरी है, थाह मिली न ईकी। 
ईसुर सांसऊ सरग नसेनी, रामायन तुलसी की।”

सांस्कृतिक चेतना जगाने व कुरीतियों पर प्रहार करने हेतु दुव्र्यसनों पर भी उन्होंने पैनी धार चलाई ...
“गांजो पियो न प्रीतम प्यारे, जर में कमल तुमारे। 
जारत काम बिगारत सूरत, सूखत रक्तिन मारे।।”
ईसुरी ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन भावों को शब्दों में पिरोना वे बखूबी जानते थे। ईसुरी का रचनाकाल सन् 1865 से 1910 के मध्य का माना जाता है। उनकी फागों की संख्या का भी कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। हालांकि उठेवरा के नन्हें भैया ने ईसुरी की लगभग 4 हजार फागें एवं बुधवारा के जगन्नाथ गुप्ता ने एक हजार फागें एकत्र की थीं। 1905 में उनकी फागों का संकलन प्रकाशित भी हुआ था, जिसमें केवल 60 फागें थीं। कालान्तर में झाँसी से ‘ईसुरी प्रकाश’ नाम से एक और संग्रह प्रकाशित हुआ था, जिसमें फागों की संख्या कुछ अधिक थी।     

पड़ोसन से बात करते नायिका सपने का जिक्र करती है कि पति उनके सिरहाने आकर खडे़ हो जाते हैं। लेकिन जब सपना टूटता है तो पति को सामने न पाकर दिल भी टूट जाता है। 
“सपने दिखा परे मोय सैंया, सुनो परोसिन गुइयां। 
आपुन आय उसीसें ठाँडें, झपट परी मैं पइयां। 
उनके दृग दोऊ भर आये, मोरी भरी डबइयाँ। 
‘ईसुरी’ आँख दगा में खुल गई, हतौ उतै कोई नैयाँ।।”

बिरहिन की वेदना की मनोदशा का वर्णन ईसुरी को बिहारी, जायसी से कमतर नहीं साबित करता। 
“जौ तन हो गओ सूख छुहारो, ऊसाई हतो इकारो। 
रह गई खाल हाड़ के ऊपर, मकरी कैसो जारौ।
तन भी बांस, बांस भओ पिंजरो, रकत रहो न सारौ। 
कहत ईसुरी सुन लो प्यारी, खटका लगो तुम्हारो।”

विरह वेदना में नायिका की देह सूखकर छुहारा हो गई। हड्डियों पर बस खाल रह गई है, नसें ऐसे लगती जैसे मकड़ी का जाला हो, शरीर बांस जैसा और बदन में रक्त का नाम तक नहीं। 

वह कवि भी क्या जो वीर रस में काव्य रचना न करे। वीर भूमि महोबा में रहे ईसुरी ने वीरता को धर्म-पालन व कर्तव्य-पालन से जोड़ते हुए कहा कि वीर वह है, जो समर भूमि में जान दे दे लेकिन पीठ न दिखाए ...
“जो कोउ समर-भूम लर सोवै, तन तरबारन खोवै। 
देय न पीठ, लेय छाती में घाव सालने होवे। 
जेई ज्वना खों करौ चाहिए, अदा धरम से होवै। 
ऐसे नर के मारैं ईसुरी, जस गंगा नो हौवे।”

बघौरा से प्रेम
ईसुरी का महोबा जिले के ग्राम बगौरा से विशेष लगाव रहा है। क्योंकि उन्होंने अन्य जगहों की अपेक्षा न केवल यहां पर ज्यादा समय व्यतीत किया बल्कि बघौरा को अपनी कर्मभूमि की तरह माना। तभी तो मरने के बाद दाह संस्कार के लिए उन्होंने बघौरा को चुना था। अपनी अंतिम इच्छा को उन्होंने इस रूप में व्यक्त किया था ...
”यारो इतनो जस लै लीजै, चिता अन्त न दीजे।
गंगा जू लौ मरे ईसुरी, दाग बघौरा दीजे।“

ग्राम बघौरा में ईसुरी का समाधि/चबूतरा आज भी विद्यमान है, वह चबूतरा भी मौजूद है जिस पर बैठकर ईसुरी स्नान करते थे। उनके नाम पर बना पुस्तकालय भी गाँव में है, जिसमें ताला लगा रहता है, जर्जर भवन की लिखावट भी मिट गई है। 
गाँव के बुजुर्ग पन्नालाल व त्रिलोक सिंह के अनुसार होली के दिन प्रतिवर्ष उनकी कर्मभूमि बघौरा व जन्मभूमि मऊरानीपुर में आज भी फाग गायकी का मुकाबला होता है। जिसमें उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के फाग गायक बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। ईसुरी की रची लाखों फागों में से कुछ हजार फागें ही संरक्षित हैं।

1910 में ईसुरी का निधन हो गया था। ईसुरी फाग गायकी के माध्यम से आज भी बुन्देली जनमानस के दिलों में उसी शिद्दत से विद्यमान हैं। ईसुरी की चैकड़ियों को अगर पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए व फाग गायकी को बढ़ावा दिया जाए तो ईसुरी की फागें चिरस्थायी बनी रहेंगी अन्यथा वह समय दूर नहीं जब डीजे व डिजिटल डाल्बी साउण्ड सिस्टम के दौर में जमने वाली फडें़ व चैपालों के साथ ईसुरी की फागें भी इतिहास व किंवदन्तियों का हिस्सा बन कर रह जाएंगी।

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