स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी रहा ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग भी लाइटिंग के जरिए तिरंगे में नहाया

बुंदेलखंड में उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग है। यह दुर्ग भारत का सबसे विशाल और अपराजेय दुर्गाे में गिना जाता है...

स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी रहा ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग भी लाइटिंग के जरिए तिरंगे में नहाया

बुंदेलखंड में उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग है। यह दुर्ग भारत का सबसे विशाल और अपराजेय दुर्गाे में गिना जाता है। यह दुर्ग स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन का साक्षी रहा है। यहां तमाम क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को सबक सिखाने के लिए रणनीति बनाई। आजादी के अमृत महोत्सव में पुरातत्व विभाग ने इस दुर्ग को भी सजाया संवारा और तिरंगा कलर में लाइटिंग कराई। जो रात में तिरंगे के कलर में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

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प्राचीन काल में यह दुर्ग जेजाकभुक्ति चन्देलों के आधीन था। बाद में यह 10वीं शताब्दी तक चन्देल राजपूतों के आधीन और फिर रीवा के सोलंकियों के आधीन रहा। इन राजाओं के शासनकाल में कालिंजर पर महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक, शेर शाह सूरी और हुमांयू जैसे योद्धाओं ने आक्रमण किए, लेकिन इस पर विजय पाने में असफल रहे। कालिंजर विजय अभियान में ही तोप का गोला लगने से शेरशाह की मृत्यु हो गई थी। बाद में मुगल बादशाह अकबर ने इस पर अधिकार कर लिया और किले बीरबल को तोहफे में दे दिया। 

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इस किले में कई प्राचीन मंदिर भी हैं। इनमें से कई मंदिर तीसरी से पांचवीं सदी यानी गुप्तकाल के हैं। यहां के शिव मंदिर के बारे में मान्यता है कि सागर-मंथन से निकले विष को पीने के बाद भगवान शिव ने यहीं तपस्या कर उसकी ज्वाला शांत की थी। यहां स्थित नीलकंठ मंदिर को कालिंजर के प्रांगण में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण और पूज्यनीय माना गया है। कहते हैं कि इसका निर्माण नागों ने कराया था। इस मंदिर का जिक्र पुराणों में भी है। इस मंदिर में एक शिवलिंग स्थापित है, जिसे बेहद प्राचीनतम माना गया है।

नीलकंठ मंदिर के ऊपर ही जल का एक प्राकृतिक स्रोत है, जो कभी सूखता नहीं है। इसी जल से मंदिर में मौजूद शिवलिंग का अभिषेक निरंतर प्राकृतिक तरीके से होता रहता है। वैसे बुंदेलखंड का यह इलाका सूखे के कारण जाना जाता है, लेकिन यहां कितना भी सूखा पड़े, जल का यह स्रोत कभी नहीं सूखता है। कहते हैं कि कालिंजर के किले में कई रहस्यमयी छोटी-बड़ी गुफाएं भी मौजूद हैं। इन गुफाओं के रास्तों की शुरुआत तो किले से ही होती है, लेकिन यह कहां जाकर खत्म होती है, यह कोई नहीं जानता। 

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जमीन से 800 फीट की ऊंची पहाड़ पर बना कालिंजर का यह किला जितना शांत है, उतना ही खौफनाक भी। कहते हैं कि रात होते ही यहां एक अजीब सी हलचल पैदा हो जाती है। लोगों का मानना है कि यहां मौजूद रानी महल से रात को अक्सर घुंघरुओं की आवाज सुनाई देती है। यही वजह है कि यहां दिन के समय तो लोग घूमने के लिए आते हैं, लेकिन रात होने से पहले ही वो यहां से निकल जाते हैं। इस किले में प्रवेश के लिए सात दरवाजे बने हुए हैं और ये सभी दरवाजे एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। यहां के स्तंभों और दीवारों में कई प्रतिलिपियां बनी हुई हैं। मान्यता है कि प्रतिलिपियों में यहां मौजूद खजाने का रहस्य छुपा हुआ है, जिसे अब तक कोई भी ढूंढ नहीं पाया है।

इस किले में सीता सेज नामक एक छोटी सी गुफा है, जहां एक पत्थर का पलंग और तकिया रखा हुआ है। माना जाता है कि यह जगह माता सीता की विश्रामस्थली थी। यहीं एक कुंड भी है, जो सीताकुंड कहलाता है। किले में बुड्ढा और बुड्ढी नामक दो ताल हैं, जिसके जल को औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। मान्यता है कि इनका जल चर्म रोगों के लिए लाभदायक है और इसमें स्नान करने से कुष्ठ रोग भी ठीक हो जाता है।

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