चित्रकूट : विद्या मन्दिर बना धर्मशाला, इण्टर कालेज सोलर प्लांट को दिया किराए पर  

चित्रकूट के विकास खण्ड रामनगर के ग्राम पंचायत छीबों में चंद सिक्कों के लिए सरकारी संपत्ति को किराए पर देने का मामला सामने आया है...

चित्रकूट : विद्या मन्दिर बना धर्मशाला, इण्टर कालेज सोलर प्लांट को दिया किराए पर  
इण्टर कालेज सोलर प्लांट को दिया किराए पर  

कोरोना महामारी के कारण शासन के निर्देश पर यद्यपि छात्रों के अवकाश अनिश्चितकालीन अवधि तक फिलहाल घोषित किए गए हैं, सम्भावना यही जताई जा रही है कि इसी मौके की नजाकत का फायदा उठाकर इस खाली पड़े कालेज व इसके परिसर को भुनाने की कुटिल कोशिश बड़ी साफगोई से की गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार छीबों में बन रहे सोलर प्लांट सुखबीर एग्रो एनर्जी लिमिटेड ने अपने कम्पनी में कार्य कर रहे कर्मचारियों के रहने व अपनी निजी गाड़ियों को खड़ी करने के लिए पार्किंग स्थल बनाने के लिए श्री गोस्वामी इण्टर कालेज छीबों को चुना है और उसे किराए पर ले लिया है, सूत्रों पर यदि यकीन करें तो फिलहाल कालेज परिसर को सात महीने तक के लिए एग्रीमेंट कराया गया है। कालेज को सोलर प्लांट के रहने के लिए प्रधानाचार्य ने दिया है या फिर प्रबन्धक ने किराए पर दिया है यह पता नहीं हो सका है। आखिर शिक्षा के मंदिर को किराए पर किसने दिया और क्यों दिया यह गाँव में भी चर्चा का विषय बना हुआ है, फिलहाल इसकी जानकारी अभी नहीं हो सकी है।

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इस शिक्षा के मन्दिर की बात करें तो इसकी स्थापना सन 1972 में स्व. ठाकुर उजागर सिंह के द्वारा अपनी कास्तकारी जमीन दान स्वरूप में देकर अपनी मृत्यु के बाद भी अपने नाम को स्मृति चिन्ह के रूप में जीवन्त रखने के लिए ही इसे शिक्षा की धरोहर बनाने के लिए दान में दे दिया था।

जानकार बताते हैं कि दानदाता के कोई सन्तान नहीं थी इसलिए अपने जीवन के बाद भी अपनी स्मृति को जिंदा रखने के लिए उन्होंने अपनी जमीन अपने अन्य परिवार को न देकर नाम चलने के लिए दान कर दी लेकिन उनके इस महादान की जमीन पर अब उनका कोई नाम निशान नहीं दिख रहा है।

जानकार बताते हैं कि इस कालेज के तत्कालीन संस्थापक प्रबन्धक रहे स्व.प.रामेश्वर प्रसाद द्विवेदी ने अपने कार्यकाल के दौरान कालेज की चहारदीवारी में एक शिलापट पर दानदाता स्व.ठा.उजागर सिंह का नाम लगवाया था, जो उनके बाद हुए प्रबन्धक प्रो. दीनानाथ पाण्डेय के कार्यकाल तक सुरक्षित रहा लेकिन वर्तमान स्थिति में उस शिलापट का वजूद नजर नहीं आ रहा है।

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लोगों का तो यहां तक कहना है कि जब कालेज में एक पूर्व प्रबन्धक का अंतिम संस्कार किया जा सकता है और उनकी मूर्ति स्थापित की जा सकती है तो फिर उस अनूठे दानदाता स्व.ठा. उजागर सिंह के साथ अन्याय क्यों?

उधर गाँव में चर्चा है कि जब इस कालेज में तमाम माननीयों की निधियां कई बार प्रदत्त हुई हैं तो उसे किराए पर देने का कोई विधिक कारण नहीं बनता है। सरकारी संपत्ति संस्था की होती है उस पर संस्थान के ही कार्यक्रम सम्पन्न हो सकते हैं लेकिन यहां पर इस कालेज का सर्वाधिकार एकाधिकार के रूप में स्थापित कर उसे दिखाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है।

ज्वलंत प्रश्न ये खड़ा होता है कि क्या किसी सरकारी संस्था की संपत्ति को किराये पर दिया जा सकता है?

  • आखिर इस संस्थान के जिम्मेदार अधिकारी इस मामले पर सहमत हो सकते हैं।
  • आखिर संस्था का व्यक्तिगत प्रयोग कहाँ तक उचित है?

वही मामले की जानकारी देते हुए जिला विद्यालय निरीक्षक चित्रकूट ने बताया कि मामला संज्ञान में है विद्यालय के प्रिंसिपल से आख्या मांगी गयी है अभी तक उन्होंने दी नही। जांचोपरांत जो भी तथ्य सामने आएंगे तो इस पर विधिक कड़ी कर्यवाही की जाएगी।